शैव ग्राम की तपोभूमि से उपजी ‘नीलकंठ चिकित्सा साधना’ केवल एक विधान नहीं, बल्कि काल और चेतना के मध्य का वह रहस्य है, जिसकी जड़ें शिव द्वारा हलाहल विष पान की आदिम घटना में गहराई तक धंसी हैं।
यह देह और ब्रह्मांड के गूढ़ मिलन की ऐसी कीमियागरी (रसायन-विद्या) है, जो ‘संस्कार चिकित्सा’ के रूप में मनुष्य को स्वयं में एकाकार होने का मार्ग दिखाती है।
जब संसार के आघात और कटुता रूपी विष प्राणों पर प्रहार करते हैं, तो देह का सूक्ष्म तंत्र भय और उद्वेग की आदिम प्रवृत्तियों से कांप उठता है। किंतु यह साधना उस प्रमुख प्राण-नाड़ी को साधती है, जो मस्तिष्क से लेकर हृदय और उदर तक ब्रह्मांडीय लय को नियंत्रित करती है।
विष को कंठ में धारण करने का यह अभ्यास भीतर उठने वाले तूफानों को शांत कर, देह को गहन विश्राम की समाधि में ले जाता है। यह मस्तिष्क के उस आदिम भय-केंद्र को सुप्त कर देती है, जो हमारी प्रज्ञा को ग्रस लेता है। इसके प्रभाव से साधक आवेग और प्रतिक्रिया के मध्य उस रहस्यमयी शून्य को जन्म देता है, जहाँ से उग्रता नहीं, बल्कि सचेत और शांत अनुक्रिया उत्पन्न होती है।
इस गुप्त विद्या का मुख्य केंद्र विशुद्धि चक्र अर्थात कंठ है। कंठ में श्वास और चेतना के स्थिर होते ही देह की सूक्ष्म ग्रंथियां उस ऊर्जा का संचार करती हैं, जो तनाव के विनाशकारी तत्त्वों को भस्म कर देती है। यह साधना मस्तिष्क के पुराने और विषाक्त बंधनों को तोड़कर, चेतना के नए और निर्मल पथ का निर्माण करती है।
यह मात्र मन का शोधन नहीं है, बल्कि देह के अणु-अणु में और पीढ़ियों से मिली कोशिकीय स्मृति में जमे हुए गहरे आघातों को समूल नष्ट करने की महाप्रक्रिया है।
गहरी ध्यानावस्था में जब यह विद्या फलीभूत होती है, तो जन्मों के दूषित संस्कार मिटने लगते हैं और साधक पीड़ा व आघात के हलाहल को पीकर भी शिव की भांति अडिग और शांत स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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