एक सामान्य व्यक्ति जब किसी गुरु के बाहरी आभामंडल और आडंबर में फंसकर उनके अनैतिक कृत्यों या अपराधों में सहभागी बन जाता है, तो यह रातों-रात घटने वाली घटना नहीं होती।
यह चेतना के पतन और मानसिक दासता की एक अत्यंत जटिल मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपने विवेक का क्रमिक रूप से वध कर देता है।
इस पूरी प्रक्रिया और शिष्य के मनोविज्ञान को निम्नलिखित 5 बिंदुओं के माध्यम से गहराई से समझा जा सकता है:
गुरु का बाहरी आडंबर, विशिष्ट वस्त्र, रहस्यमयी भाषा, भव्य आश्रम और चमत्कारिक दावे शिष्य के मस्तिष्क पर एक गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालते हैं। शिष्य अपने भीतर की असुरक्षा और किसी पारलौकिक सहारे की खोज के कारण उस साधारण मनुष्य में ‘ईश्वर’ की छवि देखने लगता है।
मनोविज्ञान में इसे इस रूप में देखा जाता है कि जब आप किसी व्यक्ति को पूर्ण या सर्वोच्च मान लेते हैं, तो आपका मस्तिष्क उसकी किसी भी त्रुटि या दोष को देखने से इनकार कर देता है। गुरु का हर कार्य शिष्य को पवित्र और निर्दोष लगने लगता है।
ऐसे दूषित तथाकथित धार्मिक तंत्र में प्रवेश करते ही शिष्य को सबसे पहला पाठ यही पढ़ाया जाता है कि ‘तर्क करना पाप है’ और ‘सच्चा शिष्य वही है जो आंख मूंदकर समर्पण करे’। यह एक सोची-समझी मनोवैज्ञानिक रणनीति है। जब शिष्य अपनी बुद्धि, संशय और सही-गलत परखने की क्षमता गुरु के चरणों में रख देता है, तो उसकी अपनी कोई नैतिक परिधि नहीं बचती।
इसके बाद यदि गुरु कोई स्पष्ट अपराध भी करता है, तो शिष्य का पंगु हो चुका विवेक उसे गुरु की ‘दिव्य लीला’ या किसी ‘महान उद्देश्य की पूर्ति का साधन’ मानकर उचित ठहराने लगता है।
वैचारिक अंतर्विरोध और आत्म-प्रवंचना के जाल में फंस कर खुद को धोखा देना इस मनोविज्ञान का सबसे भयानक पहलू है। जब शिष्य पहली बार गुरु को कोई अपराध या अनैतिक कार्य करते हुए देखता है, तो उसके भीतर एक भयंकर मानसिक टकराव उत्पन्न होता है।
यदि वह यह स्वीकार कर ले कि उसका ‘ईश्वर तुल्य’ गुरु एक अपराधी है, तो इसका सीधा अर्थ यह होगा कि उसकी अब तक की सारी भक्ति, उसका त्याग और उसकी पूरी जीवन दृष्टि ही झूठी थी।
इस सत्य का आघात इतना गहरा होता है कि शिष्य का मस्तिष्क आत्म-रक्षा के लिए खुद को ही धोखा देने लगता है। सत्य का सामना करने के बजाय, वह गुरु के अपराध का बचाव करने लगता है ताकि उसकी अपनी गढ़ी हुई दुनिया न टूटे।
धार्मिक निष्ठा के सामूहिक सम्मोहन के प्रभाव में शिष्य केवल गुरु से ही नहीं, बल्कि अंधभक्तों की एक बड़ी भीड़ से भी जुड़ जाता है। जब वह देखता है कि हजारों अन्य लोग भी गुरु के हर कृत्य को सही मान रहे हैं, तो ‘सामूहिक सम्मोहन’ के कारण उसकी बची-खुची व्यक्तिगत सोच भी समाप्त हो जाती है।
इसके अतिरिक्त, चालाक गुरु धीरे-धीरे शिष्य को अपने छोटे-मोटे अनैतिक कार्यों में शामिल करता है। जब शिष्य एक बार भी किसी गलत काम का हिस्सा बन जाता है, तो उसके भीतर भी अपराधबोध जन्म लेता है।
यह साझा अपराध दोनों के बीच एक विकृत मनोवैज्ञानिक बंधन बना देता है, जिसके बाद शिष्य के लिए वापस लौटना लगभग असंभव हो जाता है।
इसके अलावा पारलौकिक भय और श्राप का डर भी शिष्य के अवचेतन में यह बात बहुत गहराई से बिठा देता है कि गुरु का विरोध करने या उनका रहस्य खोलने का अर्थ है, इस लोक और परलोक दोनों में सर्वनाश।
ईश्वरीय दंड, पाप और श्राप का यह पारलौकिक भय शिष्य को इस कदर जकड़ लेता है कि वह विद्रोह करने की कल्पना से ही कांपने लगता है।
इसी मनोवैज्ञानिक चक्रव्यूह में फंसकर एक साधारण, निर्दोष व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी पूरी मानवीय संवेदना खो देता है और उस गुरु के हर अंधकारमय और आपराधिक कार्य का मूक दर्शक या सक्रिय रक्षक बन जाता है। इस अवस्था में वह शिष्य नहीं, बल्कि एक सम्मोहित उपकरण मात्र रह जाता है।
इसलिये धर्म गुरुओं के मानसिक चक्रव्यूह से सावधान रहिये ! अनावश्यक किसी धर्म गुरु के प्रभाव में आने की जरुरत नहीं है ! अपना घर परिवार पालिये ! यही ईश्वर की सच्ची सेवा है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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