जब एक इंसान परिवार का आधार होता है या अपने व्यापार व कामकाज को संभाल रहा होता है, तो वह आजीवन जिम्मेदारियों के चक्रव्यूह में घिरा रहता है। माता-पिता की उम्मीदें, पत्नी की खुशी, और बच्चों (या बेटे-बहू) के भविष्य को सुरक्षित करने की जद्दोजहद में व्यक्ति अक्सर यह भूल जाता है कि वह कोई मशीन नहीं है। उसकी भी अपनी कुछ व्यक्तिगत इच्छाएं, शौक और सपने हैं। दूसरों को खुश रखने की इस अंतहीन दौड़ में, व्यक्ति अक्सर अपना वजूद ही भुला देता है।
केवल सांस लेते रहने का अर्थ जीवित रहना नहीं है। जब कोई व्यक्ति अपनी पसंद, अपने सुकून और अपने ‘पर्सनल स्पेस’ को केवल इसलिए खत्म कर देता है ताकि उसके परिवार या समाज को कोई शिकायत न रहे, तो वह धीरे-धीरे अंदर से खोखला होने लगता है।
अपनी इच्छाओं का गला घोंटना और खुद के लिए न जीना ही असली आत्महत्या है। यह एक ऐसा अदृश्य बलिदान है, जिसकी कोई कद्र नहीं है, जिसे समाज अंततः आपका ‘कर्तव्य’ मान लेता है, और व्यक्ति अंदर ही अंदर घुटता रहता है।
इस विचार का अर्थ जिम्मेदारियों से भागना नहीं है, बल्कि एक सही संतुलन स्थापित करना है ! अपने परिवार, बच्चों और कामकाज के प्रति अपने सभी कर्त्तव्यों को पूरी निष्ठा और प्रेम से निभाएं।
लेकिन इस प्रक्रिया में खुद को दांव पर न लगाएं। आपके जीवन के कुछ निर्णय, कुछ पल और कुछ शौक सिर्फ और सिर्फ आपके होने चाहिए।
एक खाली घड़े से दूसरों की प्यास नहीं बुझाई जा सकती। जब आप खुद अंदर से खुश, संतुष्ट और जीवंत महसूस करेंगे, तभी आप अपने परिवार को भी सच्ची खुशी दे पाएंगे। अपनी शर्तों पर और अपने लिए जीना स्वार्थ नहीं है, बल्कि इंसान होने के नाते अपने अस्तित्व का सम्मान करना है। इसलिये जिम्मेदारी उठाइए, लेकिन खुद को ज़िंदा रखकर ! स्वयं को मिटा कर नहीं !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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