आज मेरे पास पूरे विश्व से बहुत से लोग अपने अपने रोगों की शांति के लिये संपर्क करते रहते हैं और शैव ग्राम में आने की जिद्द करते हैं ! उन सभी साथियों से यह मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि शैव ग्राम की नीलकंठ चिकित्सा साधना सब के लिये क्यों नहीं है ! जिसके पूरे विज्ञान को में नीचे समझा रहा हूँ !
शैव ग्राम की ‘नीलकंठ चिकित्सा साधना’ केवल एक सामान्य ध्यान या विश्राम तकनीक नहीं है, बल्कि यह मानव मनोविज्ञान, न्यूरोबायोलॉजी (स्नायुतंत्र) और आध्यात्मिक ऊर्जा कीमिया की एक अत्यंत उच्च और उन्नत चिकित्सा साधना पध्यति है।
समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को गले में धारण करने वाले शिव का प्रतीक, मनोवैज्ञानिक रूप से समाज और जीवन की नकारात्मकता, आघातों और पीड़ा को बिना स्वयं को दूषित किए धारण करने की क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है।
यही कारण है कि यह साधना हर किसी के लिए नहीं हो सकती है। इसके पीछे एक गहरा और सटीक विज्ञान कार्य करता है, जिसे निम्नलिखित स्तरों पर समझा जा सकता है:
1. स्नायुतंत्र और भावनात्मक सहनशीलता का विज्ञान
नीलकंठ अवस्था का अर्थ है विष (नकारात्मकता या आघात) को गले में रोकना, न तो उसे निगलना और न ही उसे बाहर थूकना ।
निगलने का खतरा: यदि कोई मानसिक रूप से अपरिपक्व व्यक्ति जीवन की भारी नकारात्मकता को निगलता है, तो वह अवसाद, आत्म-ग्लानि और ऑटो-इम्यून बीमारियों का शिकार हो जाएगा।
थूकने का खतरा: यदि वह उसे सहन नहीं कर पाता और बाहर फेंकता है, तो वह क्रोध, हिंसा और समाज के लिए विषैला बन जाता है।
विष को ‘कंठ’ में धारण करने के लिए एक अत्यंत मजबूत और विनियमित स्नायुतंत्र की आवश्यकता होती है। जो व्यक्ति अपने ‘फाइट या फ्लाइट’ मोड से बाहर नहीं आ पाया है, उसका एमिग्डाला इस ऊर्जा को संभाल नहीं सकता।
2. पिण्ड की प्रकृति और सीमाएं
शैव जीवन शैली के अनुसार हर शरीर की एक विशिष्ट प्रकृति होती है। नीलकंठ साधना के लिए शरीर और मन में एक उच्च स्तरीय संतुलन चाहिए।
जब तक व्यक्ति उचित सात्विक आहार और दिनचर्या के माध्यम से अपने त्रिदोषों को संतुलित नहीं कर लेता, तब तक यह तीव्र साधना उसके शारीरिक और मानसिक ढांचे को विखंडित कर सकती है।
3. ‘संस्कार चिकित्सा’ के बिना पात्रता का अभाव
कोई भी व्यक्ति बाहरी विष को तब तक नहीं संभाल सकता, जब तक कि उसके भीतर का मानसिक विष साफ न हो गया हो। अवचेतन मन में दबे हुए पुराने आघात, पूर्वग्रह और दूषित संस्कार एक ‘कैटेलिस्ट’ का काम करते हैं।
यदि बिना ‘संस्कार चिकित्सा’ से गुज़रे कोई इस साधना में प्रवेश करता है, तो नीलकंठ बनने की बजाय वह अपने ही भीतर के अनसुलझे द्वंद्वों का शिकार हो जाएगा। इसके लिए शिव सूत्रों और पतंजलि योगसूत्रों में वर्णित चेतना के विस्तार की पूर्व-तैयारी अनिवार्य है।
4. ‘स्व में स्थिर’ होने की पूर्व-शर्त
नीलकंठ मनोविज्ञान मांग करता है कि व्यक्ति पहले पूर्ण रूप से ‘स्व में स्थिर’ हो। जो व्यक्ति दूसरों की राय, सामाजिक दबाव या परिस्थितियों के आधार पर अपनी मानसिक स्थिति बदलता रहता है, वह इस साधना के योग्य नहीं है। यह साधना उस आत्मनिर्भरता की मांग करती है जहां व्यक्ति का आंतरिक केंद्र इतना सघन हो कि बाहरी तूफान उसे हिला न सकें।
यही वह वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक कारण है जिसके चलते शैव ग्राम में इस तरह की उन्नत साधनाओं या आवासीय प्रशिक्षणों के लिए प्रतिभागियों का चयन एक कठोर प्रश्नावली और मानसिक मूल्यांकन के आधार पर होना अनिवार्य है।
यह किसी प्रकार का भेदभाव या अभिजात्यवाद नहीं है, बल्कि यह मनोवैज्ञानिक सुरक्षा का सिद्धांत है। एक कमज़ोर बर्तन में खौलता हुआ रसायन डालने से बर्तन टूट जाता है, इसलिये नीलकंठ चिकित्सा साधना के लिए पहले बर्तन (शरीर और मन) को तपाकर फौलाद बनाना पड़ता है। जो नीलकंठ चिकित्सा साधना का प्रथम चरण है ! जिसे पूरा किये बिना शैव ग्राम में आने का कोई प्रयोजन नहीं है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये
मोबाईल : 9453092553
गुरुदेव योगेश कुमार मिश्र की फोटो और नाम के साथ 1280 × 1000 पिक्सेल में कम से कम शब्दों में एक चित्र बनाइये जिसमें गुरुदेव मैरून चमकदार कुर्ता पैजामा पहने हैं गले में पीला पट्टा डाले है उसमें ॐ नम: शिवाय लिखा है वह मंच पर खड़े होकर अपने शैव ग्राम के सभागार में बहुत से शिष्यों को प्रवचन दे रहे हैं ! हाल पूरा भरा हुआ है ! ऊपर से स्पेस देते हुये बड़े शब्दों में हेडिंग रहेगी ‘नीलकंठ चिकित्सा साधना का इतिहास’ फोटो में गुरुदेव का एक ही चित्र प्रयोग कीजिये नाम के साथ कोई फोटो मत लगिए ! संपर्क 9453092553 फोटो पर गुरुदेव को माइक पर भाषण देते हुये दिखइए सभी लोग उन्हें ही देख रहे हैं

