शैव ग्राम के अतीन्द्रिय और गूढ़ रहस्यों में ‘नीलकंठ चिकित्सा साधना’ मात्र कोई लौकिक अनुष्ठान नहीं है, अपितु यह मानव चेतना के गहन अंधकार और जीवन के घोर आघातों को दिव्य ऊर्जा में रूपांतरित कर देने वाली एक परम रहस्यमयी कीमियागरी है। यह विद्या सिखाती है कि संसार के प्रलयंकारी संतापों को किस प्रकार आत्म-नियंत्रण के गुप्त तंत्र से परास्त किया जाए।
इस गुह्य विद्या का मूल ‘हलाहल का महासिद्धांत’ है। समुद्र मंथन से उपजे कालकूट विष की भांति, यह संसार साधक की ओर कटुता, घृणा, शोक और आघातों का विष फेंकता है।
साधारण मनुष्य या तो इस विष को निगल कर अपने अंतर्मन को असाध्य व्याधियों और आत्म-ग्लानि से भर लेता है, या फिर उस दाह को न सह पाने पर क्रोध व प्रतिशोध के रूप में पुनः इसी जगत पर उगल देता है। परंतु नीलकंठ विद्या का साधक इस वैचारिक हलाहल को न निगलता है, न उगलता है, अपितु उसे अपने ‘विशुद्धि चक्र’ में पूर्ण वैराग्य और अचल तटस्थता के साथ धारण कर लेता है।
इस प्रचंड अवस्था को साधने हेतु गुप्त विधानों द्वारा नाड़ियों और प्राण-वायु का संयम किया जाता है। भौतिक देह में जब उद्वेग और भय जन्म लेते हैं, तब भीतर एक अचल मौन व्याप्त करने की विद्या ही नाड़ी-तंत्र का गूढ़ जागरण है। प्रलयंकारी विक्षोभ के क्षणों में भी साधक अपनी आवेगी प्रवृत्तियों को सचेत अनुक्रियाओं में भस्म कर प्रज्ञा की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त करता है।
किंतु बाहरी हलाहल को सहने से पूर्व ‘संस्कार मार्जन’ का अत्यंत गुप्त सोपान अनिवार्य है। अवचेतन की अंधकारमयी गुफाओं में दबे जन्मों-जन्मों के भयों और मलिनताओं को भस्म किए बिना, कोई भी देह इस विष को धारण नहीं कर सकती। मलिन पात्र विष के ताप से खंड-खंड हो जाता है, अतः चित्त की समस्त वृत्तियों को शून्य कर मन को पारदर्शी स्फटिक मणि के समान बनाया जाता है।
तदुपरांत, ‘ब्रह्मास्मि क्रिया योग’ और तंत्र-शास्त्र के लुप्त सूत्रों द्वारा इस अवरुद्ध दाहक ऊर्जा का परम चेतना में ऊर्ध्वगमन होता है। चेतना के इस प्रचंड ताप को सहने के लिए पंचमहाभूतों और त्रिदोषों (वात, पित्त, कफ) के परम सामंजस्य से भौतिक काया को वज्र-समान दृढ़ बनाया जाता है। प्रकृति के गुह्य नियमों के बिना यह अलौकिक स्थिरता कदापि प्राप्त नहीं हो सकती।
इस रहस्यमयी यात्रा का चरम बिंदु माया के समस्त बंधनों से मुक्त होकर परम शून्य में लीन ‘आत्म-प्रतिष्ठित’ होना है। यह अतीन्द्रिय तंत्र साधक को इतना स्वयंभू बना देता है कि वह बाहरी जगत के कोलाहल, मोह-माया और प्रलय के मध्य भी एक अभेद्य, अतीन्द्रिय दुर्ग की भांति सदैव अडिग रहता है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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