भारतीय दर्शन का एक मूलभूत और शाश्वत सिद्धांत है, “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”। अर्थात्, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन जीवन के सभी सर्वोच्च लक्ष्यों की प्राप्ति का प्रथम साधन यह मानव शरीर ही है। इसलिए, इस शरीर की रक्षा और देखभाल करना ही ईश्वर की प्रथम और सर्वोपरि सेवा है।
वर्तमान समय में कई आडम्बरी धर्म गुरुओं ने आध्यात्मिकता की सहज परिभाषा को विकृत कर दिया है। वे अपनी महत्ता सिद्ध करने के लिए पुण्य और मोक्ष के नाम पर अतिशय उपवास, हठयोग और शरीर को कष्ट देने वाले अव्यावहारिक नियम थोपते हैं। सत्य तो यह है कि परमेश्वर ने जिस देह को इतने यत्न और विज्ञान से गढ़ा है, उसे अनावश्यक पीड़ा देना या नष्ट करना किसी भी दृष्टि से धार्मिक कृत्य नहीं हो सकता।
प्रकृति ने हर मनुष्य के शरीर की अपनी एक अनूठी जैविक लय और स्वाभाविक मांग बनाई है। इस प्राकृतिक व्यवस्था को नकार कर, अंधविश्वास में अपने स्वास्थ्य को दांव पर लगाना कोरी अज्ञानता है। सच्चा आत्म-नियंत्रण या इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना शरीर को प्रताड़ित करने में नहीं, बल्कि शरीर और मन के बीच एक स्वस्थ संतुलन स्थापित करने में है।
परमात्मा का वास ब्रह्मांड के कण-कण में है, और सबसे निकट वह हमारे भीतर स्थित है। जिस प्रकार किसी ईंट-पत्थर के मंदिर को पूर्ण श्रद्धा से स्वच्छ और सुरक्षित रखा जाता है, उसी प्रकार इस देह-रूपी देवालय को स्वस्थ रखना मनुष्य का पहला कर्तव्य है। जब यात्रा का साधन (शरीर) ही दुर्बल या जर्जर हो जाएगा, तो साध्य (ईश्वर) तक पहुँचने का मार्ग कैसे तय होगा?
अतः, पाखंड और दिखावे के जाल से स्वयं को मुक्त रखना आवश्यक है। उचित पोषण, शरीर की प्राकृतिक लय का सम्मान और शारीरिक संरक्षण के माध्यम से स्वयं को पुष्ट रखना ही सबसे बड़ा अनुष्ठान और सच्ची ईश्वर वंदना है।
किसी आडम्बरी धर्म गुरुओं के चक्कर में शरीर को नष्ट मत करो, इस शरीर की सेवा और सुरक्षा ही ईश्वर की प्रथम सेवा है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
शैव ग्राम
ईश्वर का घर
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