भगवान और अवतारवाद की अवधारणा ने भारतीय समाज को विकलांग कर दिया ! विकृत आस्था से भविष्य का भटकाव और अकर्मण्यता की उत्पत्ति हुई है !
प्रत्येक देश की आत्मा उस देश के दर्शन में बसती है, लेकिन क्या हमारा वर्तमान समाज उसी दर्शन के एक विकृत स्वरूप का शिकार हो गया है?
हमारे आस-पास ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जहाँ सफलता, विफलता, सुख और दुख का पूरा श्रेय या दोष किसी अदृश्य शक्ति पर मढ़ दिया जाता है।
धार्मिक कथाओं और आधुनिक कथावाचकों ने “ईश्वर के भरोसे जीवन जीने” की जो आख्यायिका रची है, उसने अनजाने में ही समाज की धमनियों में अकर्मण्यता का विष घोल दिया है।
यदि हम वैश्विक पटल पर देखें, तो जो देश अवतारवाद या नियतिवाद के बजाय मानवीय पुरुषार्थ पर विश्वास करते हैं, वह आज विकास के शिखर पर हैं। यह केवल एक संयोग नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक यथार्थ छिपा है।
भारतीय दर्शन का मूल कभी ‘निष्काम कर्म’ (कर्मयोग) था, जिसका अर्थ था—फल की चिंता किए बिना अपना सर्वश्रेष्ठ कर्म करना। लेकिन समय के साथ, इस सशक्त विचार को ‘भाग्यवाद’ में बदल दिया गया।
जब कोई समाज यह स्वीकार कर लेता है कि “जो कुछ भी हो रहा है, वह ईश्वरीय इच्छा से हो रहा है,” तो मनुष्य की स्वतंत्र चेतना मर जाती है।
अन्याय, गरीबी या व्यवस्था की कमियों के खिलाफ लड़ने के बजाय, समाज किसी ‘अवतार’ की प्रतीक्षा करने लगता है। यह अवतारवाद की मानसिकता सामूहिक उत्तरदायित्व और क्रांति की भावना को शिथिल कर देती है। हम समस्याओं का समाधान अपनी बाहुबल और बुद्धि में नहीं, बल्कि चमत्कारों में खोजने लगते हैं।
इसी तरह मनोविज्ञान में भी इस सामाजिक शिथिलता को बहुत स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। इसे ‘नियंत्रण का बाह्य बिंदु’ कहा जाता है।
जब व्यक्ति यह मान लेता है कि उसके जीवन की डोर किसी बाहरी शक्ति के हाथ में है, तो उसमें हालात बदलने की आंतरिक प्रेरणा पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
लगातार ईश्वर-भरोसे की शिक्षा समाज में ‘सीखी हुई असहायता’ पैदा करती है। व्यक्ति मनोवैज्ञानिक रूप से मान बैठता है कि उसके व्यक्तिगत या सामूहिक प्रयासों का कोई अर्थ नहीं है।
यही कारण है कि समाज में वैज्ञानिक चिंतन, नवाचार और उद्यमशीलता का स्थान अंधविश्वास और भाग्य-भरोसे की प्रवृत्ति ले लेती है।
दुनिया के विकसित देशों का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि विकास का मार्ग चमत्कार से नहीं, मानवीय श्रम से प्रशस्त होता है।
15वीं शताब्दी से पहले यूरोप भी अंधकार युग में था, जहाँ हर चीज के लिए ईश्वर को उत्तरदायी माना जाता था। लेकिन प्रबोधन काल ने समाज को मानववाद और तर्कवाद की ओर मोड़ा। उन्होंने नियति के बजाय मानवीय क्षमता पर भरोसा किया।
प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने अपनी पुस्तक ‘द प्रोटेस्टेंट एथिक एंड द स्पिरिट ऑफ कैपिटलिज्म’ में स्पष्ट किया कि पश्चिमी देशों की आर्थिक प्रगति का मुख्य कारण वह वैचारिक बदलाव था, जिसने कर्मकांडों के बजाय ‘कठोर मानवीय श्रम’ को ही सच्चा धर्म माना।
आधुनिक स्कैंडिनेवियाई और एशियाई देश: आज नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क हों या फिर एशियाई देश जैसे जापान और दक्षिण कोरिया जैसे राष्ट्रों की नीतियां ईश्वरीय हस्तक्षेप पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शिक्षा और कठोर अनुशासन पर टिकी हैं। यही कारण है कि वह मानव विकास सूचकांक से लेकर तकनीकी नवाचार तक में सबसे आगे हैं।
निष्कर्ष यह है कि आस्था निस्संदेह व्यक्ति को व्यक्तिगत स्तर पर मानसिक शांति और संबल दे सकती है, परंतु जब इसे सामाजिक विकास या समस्याओं के समाधान का एकमात्र विकल्प बना दिया जाता है, तो समाज पंगु होने लगता है। ‘ईश्वर के भरोसे’ बैठना एक प्रकार का बौद्धिक और शारीरिक पलायन है।
भारत को यदि 21वीं सदी में एक यथार्थपरक विश्व शक्ति बनना है, तो उसे अपने दार्शनिक चिंतन को भाग्यवाद के चंगुल से मुक्त करना होगा। हमें कथावाचकों के चमत्कारिक मायाजाल से बाहर निकलकर वापस उद्यम, तर्क और मानवीय पुरुषार्थ की स्थापना करनी होगी। क्योंकि इतिहास गवाह है, ईश्वर भी उन्हीं की सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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