भारतीय दर्शन में भी महर्षि कालिदास ने कहा है कि “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”, अर्थात शरीर ही सभी कर्तव्यों और धर्मों को पूरा करने का प्रथम साधन है।
बिना स्वस्थ शरीर के न तो संसार का आनंद लिया जा सकता है, न किसी की मदद की जा सकती है, और न ही ध्यान या ईश्वर की आराधना की जा सकती है।
इस विचार की गहराई को निम्नलिखित तरह से समझा जा सकता है !
रचना का सम्मान ही रचयिता की सच्ची पूजा है ! यदि कोई आपको एक बहुमूल्य उपहार दे, तो उस उपहार को सहेज कर रखना ही देने वाले के प्रति आपका सबसे बड़ा आभार होता है।
ईश्वर ने हमें यह जटिल और अद्भुत शरीर दिया है; इसे स्वस्थ, ऊर्जावान और व्यसनों से मुक्त रखना ही ईश्वर को धन्यवाद देने का सर्वोत्तम तरीका है।
स्वस्थ शरीर में ही मन शांत होता है ! शारीरिक पीड़ा या बीमारी में ध्यान, प्रार्थना या सकारात्मक विचार संभव नहीं हैं। जब शरीर दर्द में होता है, तो मन एकाग्र नहीं हो पाता। शरीर प्रसन्न और रोगमुक्त रहेगा, तभी आत्मा शांति का अनुभव कर सकती है।
कर्म ही असली भक्ति है ! शरीर की ‘पूजा’ का अर्थ व्यर्थ का श्रृंगार नहीं है, बल्कि सही पोषण, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और अनुशासन है।
जो व्यक्ति अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखता है, वह पूरी ऊर्जा के साथ अपने परिवार और समाज के लिए कार्य कर सकता है। परोपकार ही ईश्वर की सबसे बड़ी सेवा है।
शरीर ही सृष्टि की अनुभूति का एकमात्र माध्यम है ! हम दुनिया की हर सुंदरता को अपनी आँखों से देखते हैं और ज्ञान को मस्तिष्क से ग्रहण करते हैं।
यदि यह माध्यम (शरीर) ही कमजोर या रोगी हो जाए, तो ईश्वर की बनाई इस सुंदर सृष्टि का अनुभव और उसकी कद्र कैसे की जाएगी?
भगवान केवल मंदिरों या मूर्तियों में नहीं, बल्कि जीवन की धड़कन और चेतना में बसते हैं। अपने शरीर को एक पवित्र मंदिर मानकर उसमें शुद्ध आहार और स्वस्थ आदतों का दीप जलाना ही सबसे बड़ा अध्यात्म है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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