सभी समाज में जीने के दो तरीके हैं, एक वैष्णव और दूसरा शैव जीवन शैली !
समाज को एक सुव्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए वैष्णव ने संचय, गृहस्थ और पितृ तर्पण को नितांत आवश्यक कर्म कहा है, क्योंकि यह व्यवस्था संसार को उत्तरदायित्व सिखाती है।
वहीं शैव जीवन शैली चेतना के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने की यात्रा है ! शैव जीवन शैली का उद्देश्य वृत्ति त्याग, वैराग्य द्वारा मुक्ति को प्राप्त कर लेने का है।
यहाँ तक कि शैव अपना पिण्ड दान स्वयं कर देता है ! पिण्ड दान अर्थात उसने अपने इस पिण्ड अर्थात इस शरीर को भगवान शिव को लोक कल्याण महा कल्याण के लिये स्वेच्छा से दान कर दिया है ! इसलिये उस पर कोई सांसारिक दायित्व अर्थात संचय या गृहस्थ कर्म शेष नहीं बचता है !
इसलिये शैवों को किसी तर्पण कर्म की आवश्यकता नहीं होती है !
अर्थात दूसरे शब्दों में जहां संसार को पकड़ कर रखने की वृत्ति है, वहां पूर्वजों को तर्पण की आवश्यकता है, लेकिन जिसने भगवान शिव को लोक कल्याण महा कल्याण के लिये स्वयं को ही दान कर दिया हो और वह निरंतर जीव, जंतु, पशु, पक्षी, वनस्पति के सेवा कर्म में लग गया हो, वह इस संसार की औपचारिकताओं से मुक्त हो गया है, और उसने स्वयं को लोक कल्याण में लीन कर दिया हो, तब वह तर्पण और उत्तराधिकार के दायित्व से पारे चला गया है। उसे किसी बंधन की आवश्यकता नहीं है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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