प्रकृति का यह एक अटल नियम है कि कोई भी युगान्तकारी संकल्प एकाकी सिद्ध नहीं होता। जब कोई उच्च चेतना किसी महान लोक-कल्याणकारी प्रयोजन के लिए धरती पर अवतरित होती है, तो वह कभी अकेली नहीं आती है, बल्कि उसके साथ उसकी ‘आत्मिक टोली’ या सहयोगी समूह भी विभिन्न स्थानों और परिस्थितियों में जन्म लेता है।
यह समूह किसी सांसारिक विज्ञापन, चयन प्रक्रिया या आकस्मिक संयोग से नहीं जुड़ता, बल्कि इसके पीछे जन्म-जन्मान्तर के संचित संस्कारों और सामूहिक साधना की एक लंबी श्रृंखला होती है।
जैसे प्रवासी पक्षियों का झुंड हजारों मील की यात्रा तय करते समय बिना किसी लिखित मानचित्र के एक साथ उड़ता है, ठीक वैसे ही ये आत्माएं काल के प्रवाह में एक-दूसरे के साथ बंधी होती हैं। पूर्वजन्मों में किसी अधूरे रहे यज्ञ, साधना या समाज-उत्थान के संकल्प को पूर्ण करने के लिए ये आत्माएं पुनः एक ही कालखंड में देह धारण करती हैं।
जन्म के समय भले ही वे अलग-अलग परिवारों या भौगोलिक क्षेत्रों में हों, किंतु समय आने पर केंद्रीय उच्च चेतना का चुंबकीय आकर्षण उन्हें स्वतः ही खींचकर एक मंच पर ले आता है।
इस पूर्वजन्म के संबंध का सबसे बड़ा प्रमाण होता है, ‘तत्काल और अकारण आत्मीयता’। जब ऐसे सहयोगी पहली बार अपने मार्गदर्शक या समूह के अन्य सदस्यों से मिलते हैं, तो उन्हें किसी औपचारिक परिचय या विश्वास जीतने की प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता।
पहली ही दृष्टि या संवाद में उनके भीतर एक गहरी पहचान जागृत हो जाती है, मानो बिछड़े हुए यात्री पुनः मिल गए हों।
चूंकि उनका प्रशिक्षण वर्तमान जीवन का न होकर कई जन्मों का होता है, इसलिए उन्हें अपने जीवन-उद्देश्य को समझने में समय नहीं लगता।
संसार के लोग जहाँ अपने स्वार्थ और संबंधों के ताने-बाने में उलझे रहते हैं, वहीं इस दिव्य समूह के सदस्य अपने पूर्वजन्मों के संस्कारों से प्रेरित होकर, बिना किसी शर्त के तुरंत अपने निर्धारित दायित्वों को संभाल लेते हैं।
यह जन्म-जन्मान्तर की सामूहिक यात्रा ही उस मिशन की सबसे अभेद्य नींव होती है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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