क्या आपने कभी सोचा है कि एक सिद्ध तपस्वी और सामान्य मनुष्य के मस्तिष्क की बनावट में क्या अंतर होता है? विज्ञान अब यह प्रमाणित कर रहा है कि गहन ध्यान से मस्तिष्क का पूरा ढांचा ही बदल जाता है!
एक साधारण मनुष्य का मस्तिष्क हमेशा डर, भविष्य की चिंता और क्रोध में उलझा रहता है, क्योंकि जिससे उसके भीतर का भय-केंद्र लगातार सक्रिय रहता है।
जबकि एक तपस्वी के मस्तिष्क में यह भय वाला हिस्सा सिकुड़ कर नगण्य हो जाता है, जिससे उनके भीतर का सारा डर और घबराहट जड़ से खत्म हो जाता है।
साधक के निर्णय लेने और आत्म-जागरूकता के केंद्र बहुत अधिक विशाल और सक्रिय हो जाते हैं। इसी कारण वह हर पल पूरी तरह सजग और साक्षी भाव में रहते हैं।
उनमें स्मृतियों को सहेजने वाला मस्तिष्क का हिस्सा इतना मजबूत हो जाता है कि पुरानी कड़वी यादें या नकारात्मक विचार उन्हें कभी विचलित नहीं कर पाते। और न ही वह उन्हें अज्ञात भय से भयभीत कर पाते हैं !
इन सबसे बड़ा चमत्कार तो आज्ञा चक्र (शीर्ष ग्रंथि) पर होता है। तपस्या की अग्नि से यह पूरी तरह जागृत हो जाती है और अतींद्रिय ज्ञान के द्वार खोल देती है। यह अद्भुत रहस्य कैवल्य तपा की अनुभूति के बाद सहज हो जाता है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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