जीवन में हम अक्सर अपने छोटे-बड़े कार्यों और जिम्मेदारियों को अपने सिर का भारी बोझ या एक गंभीर ‘समस्या’ मान लेते हैं। जैसे ही हम किसी काम को समस्या के रूप में देखना शुरू करते हैं, हमारे भीतर मानसिक तनाव, उलझन और डर पैदा होने लगता है। जबकि सत्य यह है कि कर्म और समस्या दोनों बिल्कुल अलग पहलू हैं।
कर्म जीवन का स्वाभाविक प्रवाह है। सांस लेना, चलना, नौकरी या व्यापार करना और अपने कर्तव्यों को निभाना यह सब जीवन की गति है। कर्म अपने आप में पूरी तरह तटस्थ होता है, वह न तो अच्छा होता है और न ही बुरा।
दूसरी ओर, समस्या एक मानसिक प्रतिक्रिया है। जब हम काम के परिणामों को लेकर अत्यधिक चिंतित हो जाते हैं, या जब कोई स्थिति हमारी इच्छा के विरुद्ध होती है, तब हम उसे ‘समस्या’ का नाम दे देते हैं।
जब हम कर्म को समस्या समझने लगते हैं, तो हम भविष्य के परिणामों के मोह में उलझ जाते हैं। भगवद्गीता में भी स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर कभी नहीं।
जब हम फल के मालिक बनना चाहते हैं, तो साधारण सी चुनौती भी एक पहाड़ जैसी समस्या बन जाती है। इसके विपरीत, यदि हम हर कार्य को केवल ‘कर्म’ समझकर पूरी ईमानदारी और निष्ठा से करें, तो मन का आधा तनाव तो वैसे ही समाप्त हो जाता है।
कर्म को कर्म मानने से जीवन में चमत्कारी बदलाव आते हैं। व्यक्ति का ध्यान भविष्य की चिंताओं से हटकर वर्तमान क्षण पर केंद्रित हो जाता है, जिससे उसकी कार्यकुशलता और उत्पादकता में जबरदस्त वृद्धि होती है। असफलता मिलने पर निराशा नहीं होती और सफलता मिलने पर अहंकार नहीं उपजता।
वास्तव में कर्म जीवन का पहिया है और समस्या हमारे मन का केवल एक भ्रम है। जब हम कार्यों को बोझ के रूप में देखना बंद कर उन्हें एक सहज कर्तव्य मान लेते हैं, तो जीवन का हर संघर्ष अपने आप एक सुंदर अवसर में बदल जाता है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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