अघोर साधना से आत्म दर्शन कैसे करें : Yogesh Mishra

अघोर विश्वास के अनुसार अघोर शब्द मूलतः दो शब्दों ‘अ’ और ‘घोर’ से मिल कर बना है ! जिसका अर्थ है जो कि घोर न हो अर्थात सहज और सरल हो ! इसका अर्थ यह हुआ कि व्यक्ति का अघोर होने की पहली शर्त यह है कि व्यक्ति संसार के प्रभाव में अपने स्वभाव में कठोरता और आडम्बर नहीं लाना चाहिये ! जो कि आज के युग में सबसे कठिन कार्य है ! प्रत्येक मानव जन्मजात रूप से अघोर अर्थात सहज होता है ! बालक ज्यों ज्यों बड़ा होता है त्यों त्यों वह धूर्तता और आडम्बर सीख जाता है और बाद में उसके अंदर विभिन्न तरह की बुराइयां और असहजतायें घर कर लेती हैं और वह अपने मूल प्रकृति स्वरूप यानी अघोर स्वरूप में नहीं रह जाता है !

अघोर साधना के द्वारा व्यक्ति पुनः अपने सहज और मूल स्वरूप में आ सकते हैं और इस मूल स्वरूप का ज्ञान होने पर ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है ! अघोर संप्रदाय के साधक समदृष्टि के लियह ही नर मुंडों की माला पहनते हैं और नर मुंडों को पात्र के तौर पर प्रयोग भी करते हैं ! चिता के भस्म का शरीर पर लेपन और चिताग्नि पर भोजन पकाना इत्यादि सामान्य कार्य करते हैं ! जिससे यह सन्देश देते हैं कि जीवन का यही अंतिम सत्य है और अग्नि कभी दूषित नहीं होती है ! अंत समय में इसी अग्नि में प्रवेश करना है ! अत: व्यर्थ का सांसारिक आडम्बर क्यों ? व्यर्थ का संग्रह और भागदौड़ क्यों ! अघोर दृष्टि में स्थान भेद भी नहीं होता अर्थात महल या श्मशान एक समान होते हैं !

अघोर साधनायें मुख्यतः श्मशान घाटों और निर्जन स्थानों पर ही की जाती है ! जहाँ संसार का प्रभाव कम से कम हो ! अघोर साधना स्व को जानने की एक विशेष क्रिया है ! जिसके द्वारा स्वयं के अस्तित्व के विभिन्न चरणों की प्रतीकात्मक रूप में पहचाना जाता है !

समस्त संसार वराणसी या काशी को भारत के सबसे प्रमुख अघोर स्थान के तौर पर मानते हैं ! भगवन शिव की स्वयं की नगरी होने के कारण यहां पर विभिन्न अघोर साधकों ने तपस्या की है ! यहां बाबा कीनाराम का स्थल एक महत्वपूर्ण तीर्थ भी है ! काशी के अतिरिक्त गुजरात के जूनागढ़ का गिरनार पर्वत भी अघोर साधकों के लियह एक महत्वपूर्ण स्थान है ! जूनागढ़ को लोग अवधूत भगवन दत्तात्रेय के तपस्या स्थल के रूप में जानते हैं !

अघोर साधना अत्यन्त सूक्ष्म प्रक्रिया है ! इस तथ्य को बहुत थोडे लोग जानते हैं ! कुणडलिनी छोटे-छोटे तन्तुओं से बनी ज्योति तसम रस्सी सम होती है ! सुषुम्ना नाडी अत्यन्त पतली नाडी है ! पापों और बुराइयों के कारण यह इतनी संकीर्ण हो जाती है कि कुण्डलिनी के सूक्ष्म तन्तु ही इसमें से गुजर सकते हैं ! यह अत्यन्त सुक्ष्म और गहन प्रक्रिया है !

मूलाधार से इस पतले मार्ग में कम से कम एक एक कर के ही सूक्ष्म तन्तु गुजर सकता है ! उसी एक तन्तु से यह ब्रह्मरन्द्र का भेदन होता है ! आरम्भ में अधिकतर लोगों में यह घटना आसानी से घट जाती है ! साधना के शुरुआत में देखने पर उन्हैं लगता है कि यह सब चीजों उनके अन्दर निहित हैं और वह आनंदित हो जाते हैं ! लेकिन बिना गुरु के साधना करने पर संस्कार के बोझ के दबाव से पुनः ऊर्जा जब नीचे की ओर खिंच जाती है ! तो साधक को पुनः वह आन्नद नहीं मिलता है ! तब उसे बहुत बडा झटका लगता है ! तब वह घबराकर संशयालु बन जाते हैं !

मूलाधार चक्र सबसे अधिक कोमल और सबसे अधिक शक्तिशाली ऊर्जा का केन्द्र है ! इसकी बहुत सी सतहें होती हैं और बहुत से आयाम भी ! यदि मूलाधार ऊर्जा ठीक नहीं है तो आपकी याददास्त खराब हो जायेगी ! आपका विवेक गडबड हो सकता है ! आपमें दिशा विवेक नहीं रहेगा ! अमेरिका में 40 वर्ष से कम उम्र में इसी प्रकार का पागलपन रोग अब ज्यादातर आ रहा है ! इसका कारण मूलाधार चक्र का खराब होना ही है !

बहुत से असाध्य रोग दुर्वल मूलाधार के कारण ही शरीर में आते हैं ! जिनका एलोपैथी में कोई इलाज नहीं है ! 90प्रतिशत मानसिक रोगी दुर्वल मूलाधार के कारण ही रोगी होते हैं ! यदि व्यक्ति का मूलाधार शक्तिशाली है तो उसे किसी भी प्रकार की मानसिक तकलीफ नहीं होती है ! लोग रोग होने पर मस्तिष्क को दोष देते हैं ! पर यह रोग मस्तिष्क के कारण नहीं बल्कि मूलाधार के कारण होते हैं ! इसलिये मूलाधार के प्रति सर्वाधिक विवेकशील होना चाहिये !

आत्म साक्षात्कार के बाद जब आप चक्रों की तरह घूमते हुय़े बहुत से छल्ले देखते हैं ! तब आत्मा सभी तत्वों के कारण-कार्य़ सम्बन्धों से लीला हो जाती है ! छल्लों के रूप में यह ऊर्जा हमारे शरीर के पिछले हिस्से से जुडी होती है ! सभी चक्रों एवं पावन अस्थि में इसका निवास होता है ! यह सात छल्ले बनाती है ! आत्म साक्षात्कार के पश्चात आप चक्रों के इर्द-गिर्द घूमते हुये और एक छल्ले को दूसरे छल्ले में जाते हुये बहुत से छल्लों में आप ऊर्जा का संचार देख सकते हैं !

कभी-कभी तो एक छल्ले में बहुत से छल्ले और कभी एक छल्ले में चिंगारियों जैसे अर्धविराम चिन्ह भी आप देख सकते हैं ! यह आत्मा का चेतन्य स्वरूप होता है ! यह आपकी ही पूर्व के मृत संस्कार होते हैं ! यह हमारे ऊपर ग्री क्षेत्र में प्रतिविम्बित होती है ! हाल ही में अमेरिका में एक कोषाणु के ग्राही का फोटो लिया गया ! यह बिल्कुल वैसा ही दिखाई दिया जैसा आप आत्म साक्षात्कार के बाद देखते हैं !

लेकिन यह सब व्यक्ति पर जब किसी गुरु की कृपा होती है तब ही आत्मस्वरूप में दिखती है ! यह सब आपके ही आत्मस्वरूप का प्रतिविम्बि है ! यह आत्मा किसी भी चक्र से या सभी चक्रों में जुड सकती है ! अनियंत्रित ऊर्जा के संचार में यही ऊर्जा व्यक्ति अचेतन हो जाता है और मादकता, मिर्गी, मस्तिष्क रोग तथा कैंसर आदि रोगों का कारण बनती है !

पर एक बार अघोर साधना की सिद्धि हो जाने के बाद आप अपने पूर्व के सैकड़ों जन्मों को देख सकते हैं और अति सिद्धि हो जाने पर भविष्य के भी दर्जनों जन्मों को देखा जा सकता है ! ऐसा हमारे पूर्व के साधकों ने अपनी अनुभूति के आधार पर कहा है ! यही इस विद्या का सबसे बड़ा चमत्कार है जो विश्व की किसी अन्य विद्या में नहीं है !

लोक मानस में अघोर संप्रदाय के बारे में अनेक भ्रांतिया और रहस्य कथाएं भी प्रचलित हैं ! अघोर विज्ञान में इन सब भ्रांतियों को खारिज कर के इन क्रियाओं और विश्वासों को विशुद्ध विज्ञान के रूप में तार्किक ढ़ंग से प्रतिष्ठित किया गया है !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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