मानवता का अंतिम विकल्प शिवत्व की साधना है
शिवत्व साधना का अर्थ कृतिम सांसारिक बंधनों और अहंकार से मुक्त होकर स्व का आत्म-साक्षात्कार करना है। यह महज पूजा-पाठ कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि स्वयं के रूपांतरण और भीतर दिव्यता के अवतरण की गहरी प्रक्रिया है !
ईश्वर चाहता है कि आप किसी मानव निर्मित मर्यादा में न बंधें, बल्कि अपने जैविक लय के साथ जियें !
जो व्यक्ति अपने जैविक लय में स्थिर होकर जीवन जीता है वही शिवत्व को प्राप्त करता है !
ज्यादातर लोग समाज द्वारा निर्मित पहचान, पद, प्रतिष्ठा और अहंकार को ही सच मान बैठते हैं और इन सांसारिक मुखौटों की दौड़ में दौड़ते रहते हैं !
जबकि शिवत्व की शुरुआत वहीं से होती है जहाँ व्यक्ति इन मुखौटों को उतार फेंकता है। यह “मैं यह हूँ” या “मैं वह हूँ” के भ्रम से मुक्त होकर, ईश्वर द्वारा प्रदत्त अपने शुद्ध स्वरूप में स्थिर हो जाता है।
यह घटना बाहर नहीं घटती है, बल्कि स्वयं के सांसारिक पहचान को मिटाकर, अपने भीतर छिपी असीम ऊर्जा और दिव्यता (शिव तत्व) को पुन: प्राप्त कर लेना ही शिवत्व की साधना है।
समाज ने जीने के लिए कृत्रिम नियम, घड़ियाँ और समय सारणियाँ बना रखी हैं, जो अक्सर मनुष्य की आंतरिक प्रकृतिक लय के विपरीत हैं।
ईश्वर या ब्रह्मांड की अपनी एक लय है, जिसे संसार ‘कॉस्मिक रिदम’ या ‘बायोलॉजिकल क्लॉक’ कहता है। जब कोई व्यक्ति बाहरी दुनिया के शोर को छोड़कर अपनी इस आंतरिक जैविक लय को पुन: प्राप्त कर लेता है और उसके अनुकूल जीता है, तो उसके पोषण की जिम्मेदारी शिव की हो जाती है और उसके जीवन का संघर्ष समाप्त हो जाता है।
इसीलिये शिवत्व को मानवता का अंतिम विकल्प कहा गया है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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