अग्नि आक्रान्ता वैष्णव की खोज है : Yogesh Mishra

वैष्णव धर्म ग्रंथों में अग्नि को मानव इतिहास की सबसे बड़ी खोज बतलाया गया है ! जबकि शैव जीवन शैली में अग्नि का कोई महत्व नहीं है ! क्योंकि वह प्रकृति के सहयोगी और उपासक हैं !

मानव में मात्र आक्रान्ता मनुष्य ही अग्नि द्वारा काम लेते हैं ! शेष प्रकृति के सहायक, आस्थावान मानव, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, वनस्पति आदि तो अग्नि से दूर रहना ही पसंद करते हैं !

वन में शिकार के दौरान वैष्णव राजाओं को पशुओं से की गयी हिंसा के उपरांत जीव जन्तुओं से अपनी रक्षा के लिये अपने चारों ओर अग्नि जला कर रखनी पड़ती थी ! क्योंकि जिन पशुओं को वैष्णव राजाओं ने मारा है, उनके प्रिय जन पशु अंधेरे का लाभ उठाकर किसी भी समय उन वैष्णव हत्यारे राजाओं पर आक्रमण कर सकते थे !

जबकि शैव जीवन शैली जीने वाले साधु-संत, महात्मा, ऋषि आदि तो अपने व्यक्तित्व और ज्ञान से हिंसक पशुओं को भी अपना मित्र बना लेते थे ! जिसका जीता जागता उदाहरण आज भी थाईलैंड के टाइगर टेंपल में देखा जा सकता है !

आधुनिक वैज्ञानिक युग में भी वैश्विक साम्राज्यवाद के पोषक प्रकृति पर विश्वास न करने वाले वैष्णव मनुष्य ही अग्नि के द्वारा विविध कृत्यों को पूर्ण करते हैं !

उन्होंने विज्ञान की मदद से नियंत्रित अग्नि द्वारा वह शक्ति उत्पन्न की है, जिससे वह रेलगाड़ी चलते हैं ! विमान उड़ते हैं ! अग्नि द्वारा ही उनकी सभी पाकक्रिया सम्पन्न होती है ! जिससे मनुष्य का जीवन कृतिम आहार विहार में फंस कर रह गया है !

जबकि  गर्भाशय में मनुष्य का निर्माण जल में ही होता है ! अत: मनुष्य की उत्पत्ति तो जल से ही है ! मनुष्य का अग्नि से संपर्क तो जन्म लेने के बाद अप्रकृतिक जीवन शैली के कारण शुरू होता है !

आक्रान्ता वैष्णव विचारक मनुष्य ही महायुद्धों में अग्नि से बने हुये धातु के हथियारों से ही वीभत्स जन संहार किया करते थे ! यह सभी हथियार अग्नि के सहयोग से ही बनते थे !

आधुनिक युग में उसी के आश्रय से बन्दूक चलती है, तोप चलाई जाती है, सर्व संहारक अस्त्र चलते हैं, बम डाले जाते हैं ! आदि आदि

आज के युग में भी जिस देश के पास तेल, कोयला आदि अग्नि के साधन नहीं हैं ! वह निर्बल है और अन्त में वह हार जाता है ! इसी कारण आक्रमणकारी देश सबसे पहले दूसरे राष्ट्र के पैट्रोलियाम और कोयले खानें आदि को नष्ट करने की चेष्टा करते हैं ! जिससे शत्रु की पराजय सुनिश्चित की जा सके !

आज अग्नि के उत्पादन और उससे संहार के नवीन प्रकारों का उद्भावन विज्ञान की मदद से किया जा रहा है ! परन्तु प्राचीन युग में अग्नि द्वारा शत्रुओं को नष्ट करने के लिये दिव्य शक्ति के उत्पादन का याज्ञिक प्रयोग किया जाता था !

जैसे आजकल विधान विशेष से अग्नि में पैट्रोल और कोयले की आहुति देकर भौतिक शक्ति पैदा की जाती हैं ! वैसे ही पुरा काल में प्राचीन ऋषि−मुनि विशेष विधान एवं मन्त्र विशेष से द्रव्य विशेष की आहुति देकर दिव्य शक्ति को उत्पन्न करके अपने तथा दूसरों के मनोरथ को पूर्ण करते थे !

इसीलिए सभी वैष्णव राजा अपने विशेष प्रयोजन के लिए विभिन्न यज्ञ किया करते थे ! जैसे अश्वमेध यज्ञ, पुत्रेष्ट यज्ञ, बाजपेई यज्ञ आदि आदि ! आजकल यद्यपि इसका प्रचार लुप्त हो गया है !

अर्वाचीन जड़ विज्ञान जिन बाधाओं को हटाने में सर्वथा असमर्थ है !  प्राच्य वैष्णव विज्ञान में उन बाधाओं को यज्ञ के द्वारा जप−पाठ, अनुष्ठान आदि करके हटाया जाता था ! इसीलिये वैष्णव ऋषियों द्वारा वेदों में यज्ञ विद्या भरी हुई है ! कल्पसूत्र में भी इनके विनियोग दिखलायी पड़ते हैं !

किंतु अज्ञानी वैष्णव साम्राज्यवादी विचारधारा के व्यक्तियों द्वारा अग्नि की यह स्वार्थ पूर्ण उपासना सदा सर्वदा मानव जाति के विनाश का कारण ही रहेगी ! इसीलिए शैव जीवन शैली का अनुगमन करके व्यक्ति को प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करके जीवन जीना चाहिये !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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