अष्टावक्र गीता का सार : Yogesh Mishra

 “अष्टावक्र गीता” का आरंभ राजा जनक द्वारा पूछे गये तीन प्रश्नों से होता है !

1. ज्ञान कैसे होता है ?

2.  मुक्ति कैसे होती है ?

3. वैराग्य कैसे होता है ?

सभी आध्यात्मिक व्यक्तियों के अनादि काल से यही तीन मौलिक प्रश्न हैं अर्थात संपूर्ण अध्यात्म का सार इन तीन प्रश्नों में ही समाहित है !       

जनक के इन तीन प्रश्नों का समाधान अष्टावक्र ने तीन वाक्य में कर दिया एवं इन्हें सुनते-सुनते ही जनक को आत्मानुभूति प्राप्त हो गई !

जब अष्टावक्र जैसे योग्य गुरु और जनक जैसे योग्य पात्र शिष्य का मिलन होता है, तो आध्यात्मिक क्रांति पल में ही हो जाती है ! आत्मा को जानने की पात्रता तत्काल प्राप्त हो जाती है ! यह भी सच है कि इसमें पूर्व के कई जन्मों के तप का योगदान होता है ! तब ऐसा संयोग बनता है !                                                                                                                                                                    

 राजा जनक में आत्म ऊर्जा का बोध था ! वह विद्वान थे ! उनमें ईश्वरीय ऊर्जा को जानने की समझ थी ! इसलिए अष्टावक्र ने उन्हें कोई विधियाँ नहीं बतलायी और न ही यम-नियम साधने को कहा ! न कोई आसन, मुद्रा, योग, प्राणायाम, ध्यान आदि करने को कहा ! अष्टावक्र ने सीधे उनके बोध को स्पर्श किया और राजा जनक आध्यात्मिक रूप से जागृत हो गये !

अष्टावक्र का सारा बल ज्ञान पर है !  शरीर, मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार पर नहीं ! जिसे संसार में रसास्वाद के कारण सुख-दुख का अनुभव होता है !  

जबकि अष्टावक्र का कहना है जीव इनमे से कोई नहीं है ! वह विशुद्ध चैतन्य है !  शरीर में स्थित यह चैतन्य आत्मा एवं विश्व की समस्त आत्माओं में एकत्त्वभाव है ! अर्थात विभिन्न योनियों की सभी आत्मा ब्रह्म है ! यह ईश्वर से भिन्न नहीं है ! हम यह भिन्नता अज्ञानता के कारण महसूस करते हैं ! जबकि दोनों अभिन्न हैं !

  यह चैतन्य आत्मा, न कर्ता है, न भोक्ता है !  यह सबका साक्षी, निर्विकार, निरंजन, क्रिया रहित एवं स्वयं प्रकाशित है !

यह समस्त संसार में व्याप्त है एवं समस्त संसार इसमें व्याप्त है ! संसार उसी चेतन की अभिव्यक्ति मात्र है ! इस चैतन्य का ज्ञान हो जाना ही मुक्ति है !

    अष्टावक्र कहते हैं कि मोक्ष कोई वस्तु नहीं है, जिसे प्राप्त किया जाये !  न कोई स्थान है,जहां पहुंचा जाये ! न कोई भोग है, जिसे भोगा जा सके ! न रस है, जिसमें रसास्वादन किया जा सके ! न इसकी कोई साधना है ! न इसकी कोई सिद्धि है ! न यह स्वर्ग में है ! न ही किसी सिद्धशिला आसन पर !

    अर्थात मनुष्य की विषयों से स्वाभाविक विरक्ति ही मुक्ति है ! विषयों में रस है तो संसार है ! जब मन विषयों से विरस हो जाता है ! तब हम मुक्ति हो जाते हैं ! विषयों में अनासक्त हो जाना ही मुक्ति है ! यही वैराग्य, ज्ञान, मुक्ति का संपूर्ण विज्ञान है !

 इसलिये अष्टावक्र कहते है कि “इन सांसारिक विषयों के प्रति जो तुम्हारी आसक्ति है, उसे विष के समान मानकर छोड़ दे तथा स्वयं को वही शुद्ध चैतन्य आत्मा मानकर उसमें निष्ठापूर्वक स्थित हो जाओ ! तुम्हारी मुक्ति सुनिश्चित है ! कहीं अन्य भटकने की आवश्यकता नहीं है !”

   लेकिन अष्टावक्र की यह विधि प्रखर एवं तीव्र-प्रतिभा संपन्न व्यक्ति के लिये ही उपयोगी है ! सामान्य व्यक्तियों को आत्म चेतना विकसित करने के लिये किसी न किसी प्रक्रिया से गुजरना ही होगा ! इसीलिये अध्यात्म में भिन्न-भिन्न स्तर के व्यक्तियों के लिए आत्म कल्याण हेतु भिन्न-भिन्न मार्ग हैं !    

अष्टावक्र का आत्मज्ञान निश्चित ही के जिज्ञासु व्यक्तियों के लिए एक ऐसी नौका है ! जिसमें बैठकर इस संसार रूपी भवसागर से सुरक्षित पार पहुंचा जा सकता है ! जो प्रत्येक जीव की उच्चतम अवस्था है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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