प्राय: व्यक्ति अपने भविष्य को जानने के लिए बहुत बड़े-बड़े ज्योतिषियों और तांत्रिकों की तलाश करता रहता है, और अपने मेहनत से कमाये धन का लाखों रुपये इन ठगों को रत्न, रुद्राक्ष, पूजा, अनुष्ठान आदि के नाम पर देते रहते हैं !
आज मैं इस लेख के माध्यम से स्वत: भविष्य परीक्षण का सिद्धांत बतला रहा हूं ! जिससे गोस्वामी तुलसीदास जी ने आज से 500 साल पहले ही समाज को अपने महान ग्रंथ रामचरितमानस के माध्यम से बतला दिया था !
गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार “राम के वनवास के दौरान चित्रकूट प्रवास पर माता अनुसुइया ने सीता माता को बतलाया था कि धैर्य, धर्म, मित्र और पत्नी की परख आपत्ति के समय होती है”
अर्थात यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह सूत्र आज भी उतना ही व्यावहारिक है ! जितना भगवान श्री राम के काल में था ! इस सूत्र के चार खण्ड हैं !
पहला खण्ड
जब व्यक्ति समाज में व्यावहारिक जीवन में उतरता है, तो वह प्राय: अपने निजी व्यापार, व्यवसाय के दौरान अपने शत्रुओं से घिर जाता है और उस समय शत्रु उसके प्रगति यात्रा में अवरोध पैदा करने लगते हैं !
तब उस समस्या को व्यक्ति कितने धैर्य के साथ क्रमबद्ध निपटा है, यह व्यक्ति के भविष्य परीक्षण का पहला सूत्र है !
दूसरा सूत्र
व्यक्ति ने अपने विकास के मार्ग के लिए जिन नियमों के समूह को धारण किया है, वह उसका धर्म होता है ! विपत्ति के काल में कौन व्यक्तिअपने विकास मार्ग के लिए अपने स्व धारण किये गये धर्म नियमों का कितनी कठोरता से पालन करता है, यह व्यक्ति के भविष्य परीक्षण का दूसरा सूत्र है !
अर्थात दूसरे शब्दों में व्यक्ति को विपत्ति काल में अपने स्वाधारित लक्ष्य और नियमों को बार-बार नहीं बदलना चाहिए ! तभी व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और प्रगति होती है !
और यदि व्यक्ति अपने भविष्य के लक्ष्य को नित्य बदलता रहता है या भविष्य के लक्ष्य के लिए जिन नियमों को धारण करना है, उन्हें नित्य बदलता रहता है, तो ऐसे व्यक्तियों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है !
तीसरा सूत्र
आपने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जिन मित्र और सहयोगियों का समूह बनाया है, वह आपके लक्ष्य प्राप्ति की यात्रा में कितना सकारात्मक रूप से सहायक और समर्पित हैं ! यह भी आपके भविष्य निर्धारण का महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु है !
यदि आपके मित्र और सहयोगी मात्र मौज मस्ती करने वाले, लापरवाह, आलसी, समय पर काम न करने वाले हैं, अहंकारी, धोखेबाज हैं तो आपका भविष्य निश्चित रूप से अंधकारमय है !
चौथ सूत्र
आपके जीवन में स्त्रियों की बहुत बड़ी भूमिका होती है, फिर वह चाहे माँ हो, पत्नी हो, बेटी हो, या फिर चाची, भाभी, बुआ, आदि हो !
क्योंकि विपत्ति काल में इनके द्वारा दिए गये असहयोग या ताने आपकी मानसिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं !
इसीलिए बनिया समाज अपने व्यापार, धंधे की नकारात्मक सूचना परिवार में महिलाओं को नहीं देते हैं !
इसलिए अपने व्यापार, धंधे, नौकरी आदि की हर बात अनावश्यक ही महिलाओं को नहीं बतानी चाहिए ! नहीं तो वह सहयोग तो कुछ नहीं करें पायेगी और अपने तानों से आपकी विचार क्षमता और कार्य क्षमता को भी कम कर देगी !
जिससे आपकी छोटी-छोटी समस्या भी बहुत बड़ी-बड़ी समस्या दिखाई देने लगेगी और आपका जीवन भी अंधकारमय हो जाएगा !
इसी को गोस्वामी तुलसीदास जी ने सहज शब्दों में कहा है कि अपनी समस्या पर कभी भी वृद्ध अर्थात शक्तिहीन, रोगी अर्थात स्वास्थ्य हीन, मूर्ख अर्थात बुद्धिहीन, निर्धन अर्थात धन हीन, अंधा अर्थात दृष्टि हीन, बहरा अर्थात विचार हीन, क्रोधी अर्थात धैर्य हीन और अत्यन्त ही दरिद्र व्यक्ति से कभी परामर्श नहीं लेना चाहिये !
अर्थात अगर जीवन में यदि प्रगति करना है, तो उपरोक्त व्यक्तियों से सदैव दूर रहना चाहिये ! क्योंकि यह लोग पहले से ही ईश्वर के कार्य कारण के विधान के तहत अपना दण्ड स्वत: भुगत रहे हैं ! यह विपत्ति काल में आपके सहायक नहीं हो सकते हैं ! यह आपके स्व भविष्य परीक्षण और स्व भविष्य निर्माण का सूत्र !!
चौपाई
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥
बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥4॥ – अरण्यकाण्ड
धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री- इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन-॥4॥
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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