प्राय: “कालसर्प योग” का अर्थ यह माना जाता है कि यदि कुंडली में राहु और केतु के एक तरफ सभी ग्रह आ जाते हैं, तो उस कुण्डली को कालसर्प योग वाली कुण्डली कहा जाता है !
यह योग व्यक्ति के जीवन में कई तरह की समस्याओं को लाता है, जैसे नौकरी न लगना, विवाह में अनावश्यक विलम्ब होना, संतान प्राप्ति में बाधा होना या धन कमाने में बार बार असफल होना आदि आदि !
कुछ ज्योतिषियों द्वारा यह भी कहा जाता है कि यह योग पूर्व जन्म के किसी “शाप” के कारण निर्मित होता है ! जो इस जन्म में व्यक्ति को कष्ट देता है ।
जिसकी शांति के लिए व्यक्ति बहुत महंगी-महंगी पूजा करवाता है और लाखों रुपये बर्बाद कर देता है !
लेकिन मेरे निजी विश्लेषण में यह आया है कि यह “कालसर्प योग” ज्योतिष के फलित सिद्धांतों के विपरीत कपोल कल्पित भ्रम है ! जो समाज में अनावश्यक “भय” पैदा करके धन अर्जित करने का अनैतिक माध्यम है !
राहु और केतु के एक तरफ सभी ग्रहों का आ जाना एक खगोलीय घटना है, इसका व्यक्ति के जीवन के संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं है ! व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार अलग-अलग ग्रहों के प्रभाव में अलग-अलग समय पर अलग-अलग तरह के सुख या दुख भोगता है !
क्योंकि मैने निजी तौर पर कई कुंडलियों में देखा है कि व्यक्ति के कुंडली में “कालसर्प योग” होने के बाद भी व्यक्ति अन्य ग्रहों के प्रभाव में अपनी योग्यता से अधिक सफलता प्राप्त करता है और अपना जीवन आनंद के साथ व्यतीत करता है !
जिसे कुछ ज्योतिषी अब “काल अमृत योग” के नाम से प्रचारित कर रहे हैं !
इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि “कालसर्प योग” एक भ्रम है, अनावश्यक रूप से भ्रमित होकर इस योग के निवारण के लिये लाखों रुपए खर्च कर देना उचित नहीं है !
इसलिए यदि आपकी कुंडली में “कालसर्प योग” है और कोई ज्योतिषी इस योग की शांति के लिये अनावश्यक रूप से कोई पूजन बतलाता है, तो आप इस पूजन करवाने के पूर्व, किसी अन्य विद्वान ज्योतिषी से इस विषय पर अवश्य परामर्श लीजिए, जिससे “कालसर्प योग” के अनावश्यक पूजन में पैसे बर्बाद न हों, यह मेरा सुझाव है !
धन्यवाद
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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