युद्ध और विरोध प्रकृति की व्यवस्था के विपरीत विषय हैं !
दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि विरोध करने वाले व्यक्ति को प्रकृति पसंद नहीं करती है !
इसीलिए सभी का विरोध करने वाले व्यक्ति के जीवन का संघर्ष बहुत अधिक होता है !
क्योंकि वह अनावश्यक रूप से ईश्वर की कृपा प्राप्त व्यक्तियों का विरोध करते करते अंत में वह अज्ञानता में व्यक्ति का विरोध करते-करते वह ईश्वर विरोधी हो जाता है !
जिससे उसके मस्तिष्क के अंदर प्रोजेस्टेरोन, एस्ट्रोजेन, टेस्टोस्टेरोन, कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स, आर्जिनिन-वैसोप्रेसिन आदि हार्मोन पैदा होने लगते हैं !
जिसका शरीर पर नकारात्मक असर पड़ता है ! इन्हीं हार्मोन के कारण व्यक्ति नपुंसक होकर संतान विहीन हो जाता है !
या इस तरह के हार्मोन से भरा हुआ व्यक्ति जिस संतान को पैदा करता है वह नपुंसक हो जाती है और व्यक्ति का वंश क्रम रुक जाता है !
क्योंकि ईश्वर नहीं चाहता है कि संसार में विरोधी मानसिकता के व्यक्तियों की संख्या बढ़े और समाज में अनावश्यक संघर्ष पैदा हो !
इसीलिए जिन्हें हम संघर्ष नायक के रूप में को याद करते हैं, उन सभी का सर्वनाश हुआ ! फिर चाहे मगध का साम्राज्य नष्ट करने वाले चाणक्य हों या रावण का साम्राज्य नष्ट करने वाले भगवान श्री राम हों या फिर कुरु वंश का सर्वनाश करने वाले साक्षात विष्णु अवतार कृष्ण ही क्यों न हो सभी को प्रकृति ने दण्ड स्वरूप सर्वनाश का मार्ग दिखलाया !
इसलिए यदि हम अपना सर्वनाश नहीं चाहते हैं, तो हमें ईश्वर की व्यवस्था में विश्वास रखते हुए, अपने प्रगति के मार्ग पर आगे जाना चाहिए ! न कि अनावश्यक रूप से अहंकारवश किसी अन्य से विरोध का संघर्ष पैदा करना चाहिए !
मात्र विरोध का विचार ही हजार समस्याओं का जनक है ! इसके कई आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक कारण हैं ! जो विरोध की विचारधारा रखते हैं, उनका सर्वनाश प्रकृति के द्वारा सुनिश्चित है इसलिये हमें अनावश्यक किसी का विरोध नहीं करना चाहिये !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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