क्या लोकतंत्र पूंजीपतियों की नाजायज औलाद है : Yogesh Mishra

16वीं तथा 17वीं शताब्दियों में भारत को लूटने के बाद यूरोप के कुछ देशों ने अपनी नौ सैन्य शक्ति के आधार पर दूसरे महाद्वीपों पर आधिपत्य जमाना शुरू कर दिया था ! उन्होंने छल द्वारा दूसरे देशों पर धर्म तथा व्यापार के नाम पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया !

जिसमें सबसे बड़ी समस्या उन क्षेत्रों के राजघराने थे क्योंकि राजा अपने क्षेत्र में किसी भी अजनबी को व्यापार करने की या किसी नये धर्म के प्रचार की इजाजत आसानी से नहीं देते थे ! अत: इन राजघरानों को खत्म करने के लिए यूरोप के देशों में बड़े बड़े  दार्शनिकों ने अपने विचार व्यक्त करने शुरू किये ! जिसमें एक बिंदु पर जाकर सभी दार्शनिकों की सहमति बनी कि इन क्षेत्रीय और प्रभावशाली राजघरानों के विकल्प के रूप में हमें लोकतंत्र को बढ़ावा देना चाहिए !

अत: जब 17वीं सदी से लोकतंत्र की स्थापना पर प्रयोग शुरू हुये ! जिससे इसाई धर्म के विस्तार और व्यापार हेतु उपनिवेश के विस्तार के लिये पूरी दुनियां में लोकतंत्र की स्थापना की जाने लगी ! जिसके लिए पूरी दुनिया में बड़ी-बड़ी प्रायोजित हिंसक जन क्रांतियां हुई और लोकतंत्र की स्थापना के लिये लाखों निर्दोष लोगों का कत्ले आम हुआ और यह प्रयोग सफल भी हुये ! अंततः पूरी दुनिया से राजघरानों को खत्म करके धीरे धीरे लोकतंत्र की स्थापना की जाने लगी !

किन्तु पूरी दुनियां में लोकतंत्र की स्थापना के पीछे के एक सत्य को दुनियां से छिपा कर रखा गया ! वह यह था कि उस समय के युग में योरोप में मशीनों का आविष्कार भी शुरू हो गया था ! जिसे उद्योग के रूप में विकसित करने के लिए बहुत बड़ी पूंजी की आवश्यकता थी और आम समाज के किसी व्यक्ति विशेष के पास इतना पैसा नहीं हुआ करता था कि वह अकेले ही कोई भी उद्द्योग स्थापित कर सके ! अतः योरोप के समाज ने पैसे को सामूहिक रूप से खर्च करने के लिए बैंक और कंपनी पद्धति का निर्माण हुआ !

उस युग में नये नये व्यापार धनोपार्जन का एक नया प्रबल साधन बनने लगे ! अत: कृषि का महत्व कम होने लगा जिससे समाज में एक विशेष वर्ग “पूंजीपति” का निर्माण शुरू हुआ ! यह वही लोग थे जो पूरी दुनिया में धर्म और व्यापार के नाम पर मशीनों द्वारा उत्पादन कर उसका विक्रय करते थे और आत्मरक्षा के नाम पर सेना रखते थे तथा मौका देख कर उसी सेना की मदद से लूटपाट किया करते थे ! जिसमें सबसे अधिक विरोध इन्हें क्षेत्रीय राजाओं का सहना पड़ता था ! अत: इन क्षेत्रीय राजाओं के विकल्प में बहुत तेजी से इन पूंजीपति द्वारा लोकतंत्र की स्थापना की जाने लगी !

इसके अतिरिक्त इन मशीनी कृत उद्ध्योगों को चलाने के लिये कच्चे माल की भी आवश्यकता होती थी ! जिसकी आपूर्ति भी विश्व के कई अलग अलग देशों से होती थी ! जिन देशों के अलग अलग स्वभाव व संस्कार के राजघराने थे ! जिन्हें अलग अलग तरीके से नियंत्रित करना भी इन पूंजीपतियों के लिये एक बड़ी चुनौती थी !

अत: इस समस्या से निपटने के लिये क्षेत्रीय राजाओं के विकल्प के रूप में यूरोप के दार्शनिकों की राय पर इन पूंजीपतियों ने लोकतंत्र अर्थात वंश परंपरा से चुना गया राजा नहीं बल्कि जनता द्वारा चुना गया राजा ही शासन करे, इस तरह की विचारधारा का खूब जोर शोर से प्रचार प्रसार किया और समाज के निकृष्ट वर्ग को भड़का कर राजा के विरुद्ध अराजकता का वातावरण बनाना शुरू कर दिया !

इस तरह पूंजीपतियों द्वारा अपने स्वार्थ में यहीं से लोकतंत्र की शुरुआत हुई ! जिस अवांछित शासक बड़ी ही योजना बद्ध तरीके से धीरे धीरे पूरी दुनियां पर थोपते चले गये और वहां के सभी प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण ज़माने के लिये नये उपनिवेशों का निर्माण छल और बल से करते चले गये !

क्योंकि यह व्यवस्था अस्थायी राजा का निर्माण करती थी ! जो आभाव ग्रस्त परिवार के संस्कार विहीन व्यक्ति हुआ करते थे अत: उन धूर्त मक्कारों में अपने देश को लेकर कोई प्रेम नहीं होता था ! ऐसे अस्थाई राजा कम से कम समय में अपने भोग विलास के लिये अधिक से अधिक लाभ उठाने के चक्कर में आसानी से इन विदेशी पूंजीपतियों के नियंत्रण में आ जाते थे !

 क्योंकि चुनाव आदि लड़ना भी एक महंगा काम था ! जिसमें अत्यधिक धन की आवश्यकता होती थी ! जो मदद इन्हें यह पूंजीपती वर्ग ही आसानी से कर सकता था ! अत: इस तरह पूंजीपतियों द्वारा शासन पर नियंत्रण करके अपने उद्द्योग हेतु कच्चे माल व नये बाजार के लिये उपनिवेश के निर्माण का इस सहज वैकल्पिक तरीके ने लोकतंत्र को और तेजी से बढ़ावा दिया !

 इस तरह साम्राज्यवादी पूंजीपतियों की मदद परंपरागत राजघराने खत्म हो गये और उनकी जगह लोकतांत्रिक पद्धति से चुने गये राजा का चयन पूंजीपतियों की इच्छा पर किया जाने लगा ! जिससे उस देश के बाजार और प्राकृतिक संसाधनों पर विधि के अनुसार लोकतांत्रिक चरित्रहीन राजाओं द्वारा पूंजीपतियों का नियंत्रण बना रहे !

और जिस राजा ने अपने देश में इन पूंजीपतियों के नाजायज औलाद लोकतंत्र को नहीं घुसाने दिया उन्हें षडयंत्र द्वारा सैन्य शक्ति और जन विद्रोह से नष्ट कर दिया गया ! यही है लोकतंत्र के जन्म का काला ऐतिहासिक षड्यंत्र और आज भारत भी दुर्भाग्य से इस षड्यंत्र का शिकार हो गया ! जिसे अपनी समस्त सम्पदा लुटाते हुये भारत आज भी झेल रहा है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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