क्या वैष्णव विपरीत संस्कृति के हैं : Yogesh Mishra

 हिंदुओं को सदैव से यह शिकायत रही है कि मुसलमानों की जीवन शैली हिंदुओं के एकदम विपरीत है ! इसी आधार पर मुसलमानों ने मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में पाकिस्तान की मांग की थी ! जिसे तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने स्वीकार भी कर लिया था !

लेकिन भारत के संविधान की कृपा से भारत में मुसलमानों को रहने के लिये जो स्थान दिया गया उसे भारतीय न कह कर गंगा जमुनी तहजीब कहा गया ! जैसे

 हिंदू यदि पूर्व की तरफ मुंह करके आराधना करता है, तो मुसलमान पश्चिम की तरफ मुंह करके नवाज करते हैं ! हिंदू बाएं से दाएं की ओर लिखता है तो मुसलमान दाएं से बाएं की ओर लिखते हैं ! हिंदुओं में त्यौहार उत्साह का प्रतीक है, तो मुसलमानों में त्योहार गम का प्रतीक है !

हिंदू देवी देवताओं को शुद्ध शाकाहारी भोग लगा कर भक्तों में प्रसाद वितरण करते हैं, तो मुसलमानों में उनके त्योहारों पर मांसाहार को बांटने का विधान है ! ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जिनमें मुसलमानों की जीवन शैली हिंदुओं की जीवन शैली के एकदम विपरीत है !

 इसी तरह पूर्व के सनातन भारत में जब वैष्णव आक्रांताओं ने भारत पर आक्रमण किया और भारत की सनातन संस्कृति को नष्ट करके वैष्णव संस्कृति का प्रचार प्रसार किया तब उस समय भी वैष्णव आक्रांता ओं ने भारतीय शैव जीवन शैली के विपरीत वैष्णव जीवन शैली की स्थापना की !

 जिस के कुछ उदाहरण मैं आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं !

शैव जीवन शैली के आदर्श देव भगवान शिव हैं !  जिन्हें वैष्णव लोगों ने मृत्यु का देवता कहकर बदनाम किया और विष्णु को पालनहार जीवन का देवता घोषित किया !

भगवान शिव कैलाश पर्वत अर्थात विश्व के उच्चतम पर्वतीय शिखर पर सदैव बैठे रहते हैं, तो दूसरी तरफ वैष्णव ने विष्णु को क्षीर सागर अर्थात दूध के समुद्र में शेषनाग अर्थात एनाकोंडा पर सदैव लेटा हुआ ही दिखलाया है !

यहीं से सांप के दूध पीने की कल्पना विकसित हुई ! जिसे समाज आज तक ढ़ोता चला जा रहा है और नाग पंचमी के त्यौहार के अवसर पर सैकड़ों की तादाद में सांप को दूध पिला कर तथाकथित भक्त लोग सापों के फेफड़ों में दूध भर देते हैं जिससे वह तड़प-तड़प कर मर जाते हैं !

इसी तरह अति शीतल और दुर्गम स्थल पर भगवान शिव मात्र एक मृग छाल में रहते हैं ! जो उनके तपस्वी और त्यागी जीवन का प्रतीक है ! तो इसके विपरीत वैष्णव ने विष्णु को आभूषणों से लदे हुये पूर्ण पीतांबर वस्त्र में सांसारिक भोग और सफलता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है !

 भगवान शिव का शस्त्र त्रिशूल उधर्व गामी ऊर्जा का प्रतीक है, जो सदैव आकाश अर्थात ब्रह्मांड की ओर संकेत करता दिखलाई देता है ! तो वहीँ दूसरी तरफ वैष्णव ने विष्णु के गदा को पृथ्वी की ओर संकेत करते प्रस्तुत किया है, जो अधोगामी ऊर्जा का प्रतीक है !

 भगवान शिव का वाहन नंदी सदैव पृथ्वी पर विचरण करता हुआ जीव है, जो पृथ्वी से अन्न पैदा करने का भी प्रतीक है ! जिस अन्न का भक्षण करके जीव का अन्नकोष पोषित होता है और अन्नकोष का पोषण ही मनुष्य के जीवन का प्रतीक है !

 तो इसके विपरीत वैष्णव ने विष्णु का वाहन गरुण घोषित किया ! जो सदैव आकाश मार्ग में ही विचरण करता है ! जिसका पृथ्वी से कोई लेना देना नहीं है !

 भगवान शिव ने अपनी पत्नी पार्वती को समान दर्जा दिया है ! इसीलिए सभी चित्रों में भगवान शिव की पत्नी सदैव भगवान शिव के बगल में बराबरी से बैठी हुई दिखलाई जाती हैं !

जिसका आध्यात्मिक तांत्रिक स्वरूप भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप को भी प्रकट करता है ! जिसमें आधा शरीर भगवान शिव का है और आधा शरीर माता पार्वती का है ! अर्थात शैव जीवन शैली में स्त्री को पुरुष के समान सम्मान दिया गया है !

 जबकि वैष्णव जीवन शैली में माता लक्ष्मी सदैव भगवान विष्णु के नाभी स्थल के नीचे भोग व दास स्थल पैर को दबाते हुये ही दिखलाई जाती हैं ! कभी भी माता लक्ष्मी भगवान विष्णु का हाथ या सिर दबाते हुये नहीं दिखलाई जाती हैं !

इसका तात्पर्य यह है कि वैष्णव जीवन शैली में स्त्री दोयम दर्जे की नागरिक है और पुरुष उस का स्वामी है !

 यही वजह है कि वैष्णव जीवन शैली में आज भी स्त्रियों को नगरीय सभ्यता में दूसरे श्रेणी पर ही रखने का सामाजिक विधान चल आ रहा है ! जिस कुरीति को तोड़ने के लिये आये दिन सरकार को नये-नये कानून बनाने पड़ते हैं !

 इसी तरह और भी कई उदाहरण दिये जा सकते हैं ! जो यह सिद्ध करता है कि  वैष्णव जीवन शैली, शैव जीवन शैली के एकदम विपरीत है !

ठीक उसी तरह है जैसे मुस्लिम जीवन शैली, हिंदू जीवन शैली के एकदम विपरीत है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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