क्रोध ही आध्यात्मिक व्यक्ति की पहचान है : Yogesh Mishra

 क्रोध और आध्यात्मिक व्यक्ति के मध्य चोली दामन का साथ होता है ! अर्थात कहने का तात्पर्य है कि यदि आध्यात्मिक व्यक्ति यदि क्रोधी नहीं है तो इसका तात्पर्य यह है कि उसके आध्यात्मिक व्यक्ति ने अभी पूर्णता को प्राप्त नहीं किया है !

अर्थात उस में कहीं कोई बौधिक परिपक्वता अपूर्ण रह गई है या फिर वह व्यक्ति आध्यात्मिक होने का मात्र ढोंग कर रहा है ! अभी वह पूर्ण रूप से आध्यात्मिक नहीं हुआ है !

 बात सुनने में बड़ी अजीब सी लग रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि अध्यात्म की पराकाष्ठा को प्राप्त व्यक्ति यदि क्रोधी नहीं है तो इसका मतलब उसने अभी अध्यात्म की ऊंचाइयों की अनुभूति नहीं किया है !

 आध्यात्मिक व्यक्ति का क्रोध दो गुणों से संपन्न होता है ! पहला उसका क्रोध लोक कल्याण के लिये होता है और दूसरा आध्यात्मिक व्यक्ति अनावश्यक भीड़ इकट्ठी नहीं करना चाहता है, इसलिए वह क्रोध का आडंबर करता है !

 आध्यात्मिक व्यक्ति का क्रोध दो रूप में प्रकट होता है ! एक आध्यात्मिक व्यक्ति क्रोध को या तो प्रवचन के माध्यम से थूक देता है या फिर मौन के माध्यम से पी जाता है !

 जब कोई आध्यात्मिक व्यक्ति निरंतर बिना किसी स्वार्थ और लालसा के समाज या व्यक्ति को निरंतर उस के कल्याण के लिए उपदेश देता है, तो यह आध्यात्मिक प्रवचन उस आध्यात्मिक व्यक्ति के क्रोध का थूकना होता है !

अर्थात एक अल्प विकसित और पतित व्यक्ति को देखकर जब आध्यात्मिक व्यक्ति उसके कल्याण के लिए निरंतर उसे या समाज को बिना किसी अपेक्षा के उपदेश देता रहता है, तो यह आध्यात्मिक व्यक्ति के क्रोध के थूकने की प्राकृतिक प्रक्रिया है !

 किंतु जब आध्यात्मिक  व्यक्ति यह निर्णय ले लेता है कि हर व्यक्ति अपने कर्म के दंड को भोग रहा है, जो ईश्वरीय विधान है ! जिसमें किसी भी आध्यात्मिक व्यक्ति को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए ! तब वह आध्यात्मिक व्यक्ति पूर्ण मौन हो जाता है और मात्र अपने आत्म कल्याण की साधना में लग जाता है !

तब वह समाज से ज्यादा संबंध नहीं रखता है और न ही किसी को विकसित करने का प्रयास करता है ! ऐसा आध्यात्मिक व्यक्ति क्रोध को पी जाता है और “स्व” में स्थित हो जाता है ! जिसे समाज दुर्भाग्यवश क्रोध विहीन, शान्त व्यक्ति मान लेते है !

 अर्थात दूसरे शब्दों में कहने का तात्पर्य है कि क्रोध मनुष्य की मूल प्रवृत्ति का अंश है ! क्रोध सभी को आता है ! वह चाहे फिर सांसारिक व्यक्ति हो या आध्यात्मिक व्यक्ति !

आध्यात्मिक व्यक्ति क्रोध को अपने प्रवचन के माध्यम से प्रकट कर देता है और वहीँ दूसरा आध्यात्मिक व्यक्ति क्रोध को मौन के माध्यम से पी जाता है !

 इसलिए कभी भी इस भ्रम में मत रहिये कि कोई आध्यात्मिक व्यक्ति क्रोध से परे है, क्योंकि क्रोध से परे कोई व्यक्ति हो ही नहीं सकता है ! यही प्रकृति की व्यवस्था है !

 क्रोध तो साक्षात भगवान को भी अनेकों बार आया है, जिसके हजारों को उदहारण हमारे धर्म शास्त्रों में भरे पड़े हैं, तो फिर हम तो मात्र इंसान हैं !!

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योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

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ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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