आषाढ़ मास शुक्ल एकादशी से कार्तिक मास शुक्ल एकादशी तक का समय लौकिक चातुर्मास का होता है ! इसका वर्णन तरह तरह से वैष्णव धर्म ग्रंथों में खूब किया जाता है और बतलाया जाता है कि इस समय भगवान विष्णु शयन कर रहे हैं ! अतः सृष्टि की कार्य व्यवस्था भगवान शिव संभाल रहे हैं !
ऐसी स्थिति में सभी वैष्णव जीवन शैली को अपनाने वाले साधु संत महात्मा ऋषि मुनि आदि किसी एक स्थान पर 4 मार्च तक रुक कर जप मौन व्रत आदि साधना का पालन करते हैं ! इस दौरान मांस, गुड़, तैल आदि गरिष्ठ और पित्त वर्धक खाद्य सामग्रियों का प्रयोग वर्जित है !
यहां पर दो विषय विचारणीय है पहला एक वैष्णव परंपरा में एकादशी का सर्वाधिक महत्व क्यों है इसका मूल कारण यह है कि शिव जीवन शैली में प्रदोष जो की एकादशी के दो दिन बाद पड़ती है उसका सर्वाधिक महत्व रहा है क्योंकि प्रदोष के व्रत के उपरांत जब शरीर निर्मल होता है तब अमावस्या अथवा पूर्णिमा में चंद्रमा के न रहने या पूर्ण रूप से विकसित होने की स्थिति में उसके तरंगों का जो नकारात्मक प्रभाव मानव मस्तिष्क पर पड़ता है उससे मानव मस्तिष्क को कोई क्षति नहीं होती है ! जो मानसिक तरंगें मानसिक तरंगों पर आश्रित उपासना पद्धति “तंत्र” में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है !
जिस तंत्र पद्धति से सदैव वैष्णव भयभीत रहे हैं ! अतः शैवों को मानसिक रूप से कमजोर बनाने के लिये वैष्णव लोगों ने एक योजनाबद्ध तरीके से एकादशी को ही व्रत का त्यौहार घोषित किया था ! जिससे कि जो व्यक्ति एकादशी का व्रत रखने वाला है वह प्रदोष का व्रत नहीं रख सकेगा और प्रदोष व्रत के अभाव में अमावस्या और पूर्णिमा को पड़ने वाली चंद्रमा की नकारात्मक ऊर्जा से तांत्रिक साधक मानसिक रूप से कमजोर होकर अपने साधना में सफल नहीं हो सकेंगे !
इसमें एक बात ध्यान देने योग्य भी है कि प्रदोष के 2 दिन पूर्व ही एकादशी का व्रत रखने का विधान क्यों रखा गया ! द्वादशी को व्रत रखने का विधान क्यों नहीं रखा गया ! क्योंकि कभी-कभी द्वादशी तिथि चंद्र गति के कारण विलुप्त हो जाती है ! अतः ऐसी स्थिति में यदि द्वादशी को वैष्णव द्वारा व्रत रखने का विधान रखा जाता तो प्राय: द्वादशी के विलुप्त होने पर लोग प्रदोष का व्रत रख लेते और अपने मानसिक शक्तियों की क्षति से बच सकते थे ! इसलिए प्रदोष के 2 दिन पूर्व एकादशी के व्रत को योजनाबद्ध तरीके से वैष्णव लोगों द्वारा रखने का विधान समाज में प्रचलित किया गया !
अब बात करते हैं चातुर्मास की ! भारत सदैव से कृषि प्रधान देश रहा है ! प्रकृति ही भारत की दिनचर्या और जीवन यापन का माध्यम रही है ! बरसात के शुरू होते ही किसान अपने कृषि कार्य में 4 महीने के लिए व्यस्त हो जाता है ! अतः इन वैष्णव लोगों की कथा सुनने का उसके पास समय नहीं होता है !
और दूसरी तरफ बरसात के कारण नदी नाले भर जाते हैं ! यातायात के साधन उपलब्ध नहीं होते हैं ! बाढ़ आदि के कारण मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं ! जगह-जगह कथावाचक स्थलों पर पानी भर जाता है ! जमीन के अंदर बिलों में रहने वाले जहरीले जीव जंतु अत्यधिक वर्षा के कारण बिलों के बाहर निकल कर पृथ्वी पर अपनी अपनी सुरक्षा के अनुसार विचरण करने लगते हैं ! अतः वैष्णव प्रचारक घूम घूम कर वैष्णव जीवन शैली के आराध्य अवतारों का बखान नहीं कर पाते हैं ! इसलिए वह अपने किसी संपन्न शिष्य के यहां 4 माह तक रुक कर बरसात के मौसम के निकल जाने का इंतजार करते हैं !
अतः इन बरसात के चार महीनों को वैष्णव लोग चातुर्मास साधना का नाम देते हैं ! इस दौरान बरसात महीने में यह वैष्णव प्रचारक पाचन शक्ति कमजोर हो जाने के कारण तली भुनी चीजों का सेवन नहीं करते हैं ! क्योंकि पूर्व के काल में शौच आदि के लिए बाहर सार्वजनिक स्थान पर जाना पड़ता था ! अतः यदि पेट खराब हो जाएगा तो बार-बार उन्हें साधना कक्ष के बाहर सार्वजनिक स्थान पर मल त्याग के लिए जाना पड़ेगा ! इसलिए वह लोग कोई भी तली भुनी चीज या पित्त वर्धक चीज का सेवन नहीं करते हैं !
और समाज को गुमराह करने के लिए बतला देते हैं कि इस समय वैष्णव प्रचार का कार्य मैंने इसलिए रोक दिया है कि भगवान विष्णु 4 माह के लिए सोने चले गए हैं और अब ब्रह्मांड की व्यवस्था का कार्य भगवान शिव देख रहे हैं ! इसलिए 4 माह तक कोई भी धार्मिक अनुष्ठान नहीं किया जाएगा !
यह है चातुर्मास वैष्णव के पलायनवाद का सच !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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