जीवन क्या है ? : Yogesh Mishra

 बड़े-बड़े मनीषी, चिंतक, विचारक, आध्यात्मिक गुरु और समाज के आम लोग जीवन भर यही चिंतन करते रहते हैं कि आखिर जीवन क्या है ?

 यह एक बहुत गहरा प्रश्न है और व्यक्ति इस प्रश्न का उत्तर इंद्रियों के माध्यम से खोजना चाहता है ! इसीलिए व्यक्तियों को पूरा जीवन जी लेने के बाद भी यह पता नहीं चलता है कि जीवन क्या है ?

 जबकि यदि जीवन के रहस्य को समझना है, तो पहली शर्त है कि व्यक्ति को अपने प्रति दृष्टा भाव को प्रगट करना होगा !

 क्योंकि जब तक आप स्वयं को दृष्टा भाव से नहीं देखेंगे, तब तक आप अपने जीवन के उद्देश्य को नहीं समझ पाएंगे !

 क्योंकि निर्लिप्त होकर दृष्टा भाव से देखने से ही आपको यह पता चलेगा कि मुझमें वह कौन सी कमियां हैं जिनको समाप्त करने के लिए नुझे ईश्वर ने जीवन प्रदान किया है !

 अपने जीवन को समझने के लिए व्यक्ति जो मौलिक गलती कर रहा है, वह यही है कि वह अपने ईश्वर द्वारा प्रदत्त जीवन के अवसर को समझने के लिये दृष्टा भाव में प्रवेश नहीं कर पा रहा है !

 इसीलिए पश्चिम जगत का व्यक्ति जीवन में खुशियों की प्राप्ति के लिए विधि और विज्ञान का सहारा लेता है, और पूरे जीवन विधि और विज्ञान के पीछे घूमने के बाद भी अंततः उसे खुशी नहीं मिलती है !

 और भारत का व्यक्ति अपने पूर्वजों के ऐतिहासिक शोधों का सहारा लेता है ! जिन्हें धर्म ग्रंथ कहा जाता है ! क्योंकि दुनिया के सभी धर्म ग्रंथ अपूर्ण हैं ! इसीलिए भारत का व्यक्ति भी जीवन को समझ नहीं पाता है !

 जीवन कुछ और नहीं बस सिर्फ पूर्णता को प्राप्त करने की यात्रा ही है ! जिसे दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि व्यक्ति कामना और वासना के कारण जब जन्म लेता है, तो उसके चेतना की ऊर्जा अपूर्ण विकसित होती है !

 ईश्वर व्यक्ति को यह अवसर प्रदान करता है कि वह विवेकपूर्ण जागृत अवस्था में जीवन जी का अपने चेतना की ऊर्जा को पूर्ण रूप से विकसित करे !

 लेकिन सही मार्गदर्शन के अभाव में पश्चिम के जगत का व्यक्ति विधि और विज्ञान में उलझ जाता है और भारत का व्यक्ति धर्म ग्रंथों के प्रपंचों में उलझ जाता है !

 जबकि चेतना ऊर्जा को पूर्ण विकसित करने की यात्रा वाह्य जगत में कहीं नहीं होती है ! बल्कि यह व्यक्ति के अंदर ही स्व की यात्रा है ! जो व्यक्ति अपने स्व में स्थिर हो जाता है, वह अपने चेतना की ऊर्जा को पूर्ण रूप विकसित कर और ब्रह्म को अनुभूति कर “अहम् ब्रह्मास्मि” का उद्घोष करता है !

 चेतना की ऊर्जा को पूर्ण विकसित कर लेने का ईश्वर द्वारा प्रदान किया गया अवसर ही जीवन है ! जिसे हम लोग व्यर्थ के सांसारिक प्रपंचों में नष्ट कर देते हैं !

 इसलिए जीवन के रहस्य को यदि समझना है तो सर्वप्रथम दृष्टा भाव से अपने चेतना की ऊर्जा के स्तर को जानिये और स्व में स्थिर होकर उस चेतना की ऊर्जा का निरंतर विकास कीजिए ! तभी जीवन के रहस्य को आप सरलता से समझ पाएंगे !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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