कुलार्णव तंत्र के नौवें उल्लास के आधार पर माता पार्वती भगवान शिव से कहती हैं :–
“जीवः शिवः शिवो जीवः स जीवः केवलः शिवः।
पाशबद्धः स्मृतो जीवः पाशमुक्तः सदाशिवः॥”
आपके द्वारा उद्धृत यह पंक्तियाँ सनातन धर्म के ‘अद्वैत वेदांत’ और ‘तंत्र शास्त्र’ में विशेषकर शाक्त और शैव जीवन दर्शन का परम रहस्य हैं। कुलार्णव तंत्र के नौवें उल्लास का यह श्लोक जीव और शिव की तात्त्विक एकता को बेहद सरल शब्दों में प्रतिपादित करता है।
इसकी विस्तृत दार्शनिक व्याख्या के अनुसार तात्त्विक एकता भी इस सिद्धांत का समर्थन करती है, उसके अनुसार, जीव (मनुष्य या चेतना) और शिव (परमात्मा या परम चेतना) दो अलग-अलग सत्ताएँ नहीं हैं। जैसे एक ही समुद्र का पानी जब लहर बनता है, तो उसे ‘लहर’ (जीव) कहते हैं, और जब वह शांत रहता है, तो ‘समुद्र’ (शिव) कहलाता है। मूलतः दोनों जल ही हैं।
इसी सिद्धान्त को आदि शंकराचार्य ने ‘निर्वाणषट्कम’ में अद्वैत वेदांत से भी अदभुद व्याख्या की है :
“न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः… चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥”
अर्थ: न मैं प्राण हूँ, न पाँच वायु, न मन, न बुद्धि, न अहंकार… मैं तो केवल ज्ञान और आनंद का स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।
अर्थात शास्त्रों के अनुसार, जीव और शिव का संबंध ‘घड़े के आकाश’ (घटाकाश) और ‘महा आकाश’ (महाकाश) जैसा है। जब एक घड़ा रखा होता है, तो उसके अंदर की खाली जगह (आकाश) सीमित लगती है। लोग कहते हैं “यह घड़े का आकाश है।” लेकिन जैसे ही घड़ा फूटता है (अज्ञान का पाश टूटता है), घड़े का आकाश महा आकाश में विलीन हो जाता है। वह अलग कभी था ही नहीं, बस घड़े की दीवारें (अज्ञान/शरीर) उसे अलग दिखा रही थीं।
इसीलिए, तंत्र शास्त्र कहता है कि संसार से भागने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने भीतर के ‘घड़े’ को, अपने ‘पाश’ (सीमाओं) को ज्ञान के द्वारा तोड़ देने की आवश्यकता है। पाश हटते ही आप साक्षात सदाशिव ही हैं, इसकी अनुभूति हो जाती है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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