अगली पीढ़ी को नष्ट होने से बचाना होगा !
युवाओं का ‘जेन जी’ से ‘ज़ॉम्बी जनरेशन’ में तब्दील होना केवल एक कहावत नहीं, बल्कि न्यूरोलॉजिकल और मेटाबॉलिक सत्य है। पिज्जा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक और अत्यधिक कैफीन जैसे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड आहार सीधे तौर पर मस्तिष्क के ‘एक्जीक्यूटिव फंक्शन’ (निर्णय लेने की क्षमता) पर हमला करते हैं और इंसान को एक सुस्त, दोहराव वाले जीवन चक्र में कैद कर देते हैं।
सुबह अत्यधिक कैफीन/शुगर से दिन की शुरुआत खाली पेट स्ट्रांग कॉफी या मीठे बेवरेज से करने पर कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर अचानक चरम पर पहुंच जाता है। यह कृत्रिम उत्तेजना कुछ देर का भ्रम देती है, लेकिन इसके तुरंत बाद होने वाले ‘कैफीन क्रैश’ से मानसिक थकान आती है और फोकस पूरी तरह टूट जाता है।
दोपहर का भोजन में पिज्जा/बर्गर रिफाइंड मैदा और ट्रांस फैट से बना फाइबर-विहीन भोजन जो खराब वसा से बना है, वह इस भोजन के सेवन से रक्त में ग्लूकोज का स्तर बहुत तेजी से उछलता है और फिर एकदम गिर जाता है। इसका सीधा परिणाम ‘ब्रेन फॉग’ (दिमागी धुंधलापन) है। मस्तिष्क में भारीपन और गहरी सुस्ती छा जाती है, जिससे कुछ भी नया सोचने की इच्छा खत्म हो जाती है।
कोल्ड ड्रिंक्स में मौजूद हाई-फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप सीधे तौर पर मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस (सीखने और याददाश्त के केंद्र) को नुकसान पहुंचाता है। यह न्यूरोप्लास्टिसिटी को कम करता है, जिससे मस्तिष्क समस्याओं को सुलझाने या नई परिस्थितियों के अनुकूल होने में अक्षम होने लगता है।
जंक फूड डोपामीन के दुष्चक्र में फंस कर हमारे मस्तिष्क की कार्यक्षमता कैसे नष्ट होती है, इसे भी जानिये !
यह जंक फूड मस्तिष्क के ‘रिवॉर्ड सेंटर’ को नशे की तरह हैक कर लेता है। यह डोपामीन का इतना तीव्र स्राव करता है कि मस्तिष्क को सामान्य, रचनात्मक और धैर्य वाले कार्यों (जैसे पढ़ना, योजना बनाना या किसी हुनर पर काम करना) में आनंद आना बंद हो जाता है। यही वह मानसिक शून्यता है जो युवा को ‘ज़ॉम्बी’ जैसी स्थिति में धकेलती है।
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन शरीर और नर्वस सिस्टम में क्रोनिक सूजन पैदा करता है। यह सूजन मस्तिष्क की कोशिकाओं के बीच सिग्नलिंग को धीमा कर देती है, जिससे प्रतिक्रिया देने की गति और तर्कशक्ति कम हो जाती है।
गट-ब्रेन एक्सिस का टूटना अर्थात आंतों और मस्तिष्क का सीधा संबंध टूटना एक अप्राकृतिक आपदा है। प्राकृतिक, फाइबर युक्त भोजन के अभाव में आंतों के अच्छे बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं।
चूंकि शरीर का 90% सेरोटोनिन (खुशी और मानसिक स्थिरता का हार्मोन) आंतों में बनता है, इस प्रक्रिया के बाधित होने से एंग्जायटी, चिड़चिड़ापन और डिप्रेशन स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं।
यह खतरनाक आहार एक ऐसा चक्रव्यूह बनाता है जहाँ व्यक्ति ऊर्जा की कमी के कारण कोई शारीरिक या रचनात्मक उद्यम नहीं कर पाता। वह सुस्त होकर स्क्रीन स्क्रॉल करता रहता है और उस सुस्ती को तोड़ने के लिए फिर से उसी जंक फूड या कैफीन की क्रेविंग करता है।
उसकी स्वतंत्र चेतना और कुछ नया गढ़ने की क्षमता इस कृत्रिम आहार के बोझ तले दब जाती है। तंत्रिका तंत्र को इस उत्तेजना और सुस्ती के फंदे से बाहर निकालने के लिए शरीर को प्राकृतिक, अनपॉलिश्ड और ताजे सुपाच्य आहार की ही आवश्यकता होती है, जो मस्तिष्क को वास्तविक और स्थिर ऊर्जा प्रदान कर सके।
यदि आप भी इस षडयंत्र में फंस चुके हैं तो इससे से बाहर निकलने के लिये और अपने को इन्सान बनाये रखने के लिये आपको एक बार शैव ग्राम की यात्रा अवश्य करना चाहिये ! जहाँ शिव की कृपा से अगली पीढ़ी के भविष्य को संभाला जाता है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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