महावीर जैन का असली नाम वर्धमान है । यह जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे । इन्होंने 30 वर्ष की आयु में अपना घर त्याग दिया था और एक तपस्वी बन गये थे ।
इन्होंने 12 वर्षों तक तपस्या की और 42 वर्ष की आयु में इन्हों कैवल्य अर्थात दुख और सुख पर विजय प्राप्त करने का सर्वोच्च आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ था ।
इसके बाद इनके प्रथम शिष्य इनके अपने ही दामाद जमालि बने थे । वह इनके ज्ञान से बहुत प्रभावित थे ! इसके अतिरिक्त इन्होंने पावा में 11 ब्राह्मणों को जैन धर्म की दीक्षा दी थी । जो आज भी तीर्थ के रूप में जाना जाता है !
जैन धर्म के अंतिम 24वें तीर्थंकर बन कर जैन धर्म का विस्तार किया । इस जैन धर्म के संस्थापक प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देव जी आदिनाथ थे । जो भगवान श्री राम के वंश कुल से थे । ऋषभदेव का जन्म एक इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार में अयोध्या में हुआ था ।
भगवान ऋषभदेव का विवाह नन्दा और सुनन्दा से हुआ । ऋषभदेव के 100 पुत्र और दो पुत्रियाँ थी । जबकि भागवत् पुराण अनुसार भगवान ऋषभदेव का विवाह इन्द्र की पुत्री जयन्ती से हुआ था । इससे भी इनके सौ पुत्र उत्पन्न हुये थे ।
महावीर ने अपने अनुयायियों को शिक्षा देने के लिए प्राकृत भाषा का प्रयोग किया करते थे । भगवान महावीर ने अपने प्रवचनों में धर्म, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, क्षमा पर सबसे अधिक जोर दिया करते थे । त्याग और संयम, प्रेम और करुणा, शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का सार हुआ करता था ।
जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांत त्रिरत्न के नाम से जाने जाते हैं । त्रिरत्न के अंतर्गत सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन तथा सम्यक कर्म को गिना जाता है । सम्यक ज्ञान का अर्थ है कि जैन धर्म और मुक्ति के विषय में संपूर्ण और सच्चा ज्ञान । सम्यक दर्शन का अर्थ होता है तीर्थंकरों में पूर्ण विश्वास करना चाहिये ।
जैन धर्म का सबसे ज्यादा प्रसार भारत के बाहर लाओस, वियतनाम और श्रीलंका में हुआ ! जैन साहित्य के अनुसार राजा वट्टागामिनी उर्फ दत्तगामिनी के शासनकाल तक जैन तीर्थंकरों के मंदिर श्रीलंका में पाये जाते थे ।
जिन्हें बाद में बौद्ध धर्म के प्रवेश के बाद दूसरी शताब्दी ईस्वी में बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने हड़प लिया और श्रीलंका में अपना जन बल बढ़ाने के लिये श्रीलंका के शूद्रों को बहुत बड़ी संख्या में बौद्ध बना लिया !
कालांतर में यही श्रीलंका के शूद्रों से परिवर्तित बौद्ध शूद्र अपनी सुविधा की तलाश में बहुत बड़ी संख्या में बौद्ध भिक्षुओं के साथ भारत आये और भारत आकर भारतीय वैश्य समुदाय के व्यापारियों के साथ सेवक बन कर रहने लगे और भारतीय वैश्य समुदाय की कृपा से इन्होने भी व्यापार का हुनर सीखा और संपन्न हो गये !
फिर जब भारतीयों को बौद्धों के अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिये आदि गुरु शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट तथा मंडान मिश्र जी ने जन आन्दोलन शुरू किया तो अपने जीवन और सम्पत्ति की रक्षा के लिये श्रीलंका आये से हुये इन्हीं शूद्रों ने अपनी अलग पहचान बनाते हुये स्वयं को बौद्ध की जगह जैन अनुयायी घोषित कर दिया और भारत के बहु प्रतिष्ठित वैश्य समुदाय के साथ घुल मिल गये !
इसीलिये आज भी बहुत से तथाकथित जैन 24वें तीर्थंकर महावीर जैन के सिद्धांतों का अनुपालन न करते हुये गुप्त रूप से मांसाहार, वैश्या वृत्ति और मदिरा पान आदि का सेवन करने में भी कोई संकोच नहीं करते हैं !
जबकि इसके विपरीत वास्तविक भारत के बहु प्रतिष्ठित वैश्य समुदाय के प्रतिष्ठित जैन लोग बड़ी कठोरता से महावीर जैन जी के सिद्धांतों का कड़ाई से अनुपालन करते हैं और अपनी आय से बिना किसी प्रतिष्ठा की इच्छा के दान देकर बड़े बड़े विद्यालय, अस्पताल, धर्मशाला, भोजनालय आदि का निर्माण करवाते हैं !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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