ज्ञान ही सभी समस्याओं का कारण है : Yogesh Mishra

 ज्ञान और अनुभूति यह दोनों ही अलग-अलग विषय हैं ! प्रायः व्यक्ति ज्ञान को ही महत्व देता है अनुभूति को नहीं क्योंकि अंग्रेजों के शासन काल में जब अंग्रेजों ने भारत पर अपना शासन जमाया, तब उन्हें अपनी शासन व्यवस्था को चलाने के लिए उच्च स्तरीय प्रशिक्षित बौद्धिक मजदूरों की आवश्यकता थी !

यह बौद्धिक मजदूर मात्र नियमित बौद्धिक प्रशिक्षण से ही बनाए जा सकते थे ! अतः उन्होंने अनुभूति ज्ञान देने वाले गुरुकुलों को बंद करके व्यवस्थित तरीके से स्कूलों की संरचना की और अपने तरीके के बौद्धिक मजदूरों का निर्माण करना शुरू कर दिया ! जिसमें मदन मोहन मालवीय और दया नन्द सरस्वती जैसे तथाकथित विद्वानों ने उनकी मदद की !

कालांतर में इन्हीं बौद्धिक मजदूरों को निर्मित करने के लिये जिस तरह के बौद्धिक प्रशिक्षण दिये जाते थे, उन्हें इन अंग्रेज षड्यंत्रकारियों द्वारा ज्ञान कहा जाने लगा और इस तरह से बौद्धिक प्रशिक्षित मजदूर के जीवन की आर्थिक सुरक्षा के कारण लोगों का आकर्षण अपने बच्चों को बौद्धिक मजदूर बनने की ओर तेजी से विकसित हुआ !

 इन अयोग्य बौद्धिक मजदूरों को प्रति माह नियमित घर खर्च के लिए वेतन दिया जाता था ! चिकित्सा आदि की सुविधाएं फ्री थी ! प्रशासनिक शक्ति होने के कारण यह बौद्धिक मजदूर घुस आदि लेकर विलासिता पूर्ण जीवन यापन करते थे और रिटायर होने के बाद भी जब तक जीवित रहते थे, तब तक इन बौद्धिक मजदूरों को एक निश्चित मासिक आर्थिक मदद पेंशन के रूप में दी जाती थी !

 जिस वजह से समाज का बहुत बड़ा वर्ग अनुभूति आश्रित ज्ञान की जगह किताबी ज्ञान को ही वास्तविक ज्ञान समझने लगा क्योंकि संसार का सारा सुख जो धन से ख़रीदा जा सकता था ! वह इसी बौद्धिक मजदूरी से आसानी से मिल जाता था ! इस तरह समाज में वास्तविक ज्ञान जो गुरुकुलों में अनुभूति आश्रित था, उसका लोप हो गया और किताबी ज्ञान को ही समाज वास्तविक ज्ञान समझा जाने लगा !

 इसी भ्रम में समाज में मानव कल्याणकारी अनुभूतिगत ज्ञान को विलुप्त कर दिया ! अब मनुष्य अक्षर आश्रित पाठ्य पुस्तक की तरह वेद-वेदांत, उपनिषद, पुराण आदि को भी पढ़कर अपने को ज्ञानी मानने लगा जबकि यह सभी ग्रन्थ उस सड़क पर लगे हुए दिशा सूचक पट्टिका की तरह हैं जो आपको यह बतलाते हैं कि आप अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किस दिशा में जायें !

 लेकिन दुर्भाग्य यह है कि लोग इन्हीं दिशा सूचक पट्टिका को वास्तविक ज्ञान मानकर इनके अक्षरों को रट कर अपने को ज्ञानी समझने लगे और इन तथाकथिक धर्म ग्रंथों के श्लोकों में जीवन भर भटकते रहने के बाद भी, कभी भी उन्हें कोई अनुभूतिगत वास्तविक ज्ञान नहीं हो पता है और अंततः इन व्यर्थ के ग्रंथों को रट कर वह अपना अहंकार पोषित करते रहते हैं !

अत: यह कहा जा सकता है कि अनुभूति के अभाव में किताबी ज्ञान ही हमारे पतन का कारण है इसलिए अक्षर ज्ञान या पुस्तकीय ज्ञान के स्थान पर जब तक मनुष्य अनुभूतिगत ज्ञान प्राप्त नहीं करेगा ! तब तक उसका कल्याण नहीं हो सकता ! इसीलिए वर्तमान अनुभव विहीन ज्ञान ही व्यक्ति के सभी समस्याओं का कारण है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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