तत् और श्री में अंतर : Yogesh Mishra

वैष्णव जीवन शैली में धर्म के नाम पर लूट की अलग-अलग दुकान चलाने के लिए दर्जनों देवी देवताओं का निर्माण वैष्णव धर्माचार्यों ने किया है !

और अलग-अलग देवी-देवताओं को अलग-अलग मानवीय इच्छाओं की पूर्ति करने का पर्याय बना दिया है ! जिसके लिए अलग-अलग तरह के मंत्र, पूजा, अनुष्ठान, कर्मकांड आदि करने का विधान निर्मित किया है !

साथ ही वैष्णव जीवन शैली ने अवतारवाद की अवधारणा को भी समाज में प्रचलित किया है ! जिसमें वैष्णव परंपरा को मानने वाले जिन राजाओं ने शैवों का दमन कर वैष्णव का जीवन शैली का प्रचार प्रसार किया था ! उन सभी को अवतार के रूप में भगवान का दर्जा दे दिया है !

और उनके कृत्य और जीवन परिचय लिए बड़े-बड़े ग्रंथों का निर्माण किया है ! जिन की कथाएं आज तक कथावाचक समाज को सुना सुना कर समाज का आर्थिक और भावनात्मक दोहन कर रहे हैं !

 इन सभी आदर्श पुरुषों को वैष्णव लोगों ने श्री शब्द से संबोधित किया है ! श्री का तात्पर्य है जिसके अंदर समस्त सांसारिक सुख भोगने का सामर्थ्य हो !

 श्री ऋषि शब्द का उल्टा है ! ऋषि का तात्पर्य है जिसने समाज के कल्याण के लिए अपना निजी सुख त्याग दिया हो और श्री का तात्पर्य है जिसने इतनी योग्यता प्राप्त कर ली हो कि वह अब समाज के सारे सुखों को भोगने का सामर्थ्य रखता हो !

श्री के साथ ही वैष्णव लोग एक शब्द का और प्रयोग करते हैं, वह है भगवान अर्थात जिसने भ+ग+व+आ+न अर्थात भूमि, गगन, वायु, आकाश और नीर अर्थात जल पर नियंत्रण कर लिया हो !

यह सभी चीजें मनुष्य के जीवित रहने के लिए अति आवश्यक मूलभूत तत्व है और जिस व्यक्ति ने अपने पुरुषार्थ से किसी विशेष क्षेत्र के इन पांचों तत्वों पर नियंत्रण कर लिया है ! वैष्णव लोगों के अनुसार वही भगवान है !

 जबकि इसके विपरीत शैव जीवन शैली में न तो भगवान की कोई अवधारणा है और न ही श्री नाम का कोई संबोधन है !

 वहां पर ईश्वर के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया गया है, वह तत् है अर्थात “वह शिव ऊर्जा” जो हम सभी प्राणियों में बीज रूप में मौजूद है और यदि हम अनुकूल वातावरण देते हैं, तो बीज रूप में स्थापित व ऊर्जा हमें भी ईश्वर बना सकती है !

इसी स्थिति को प्राप्त करने वाले व्यक्ति को “ब्रह्म” कहा गया है “अहम् ब्रह्मास्मि” लोकोक्ति का निर्माण इसी सिद्धांत से हुआ है !

 जबकि वैष्णव जीवनशैली में आप कितना भी प्रयास कर लीजिए आप भगवान नहीं हो सकते हैं ! इसीलिए वहां पर वैष्णव राजघरानों में पैदा हुए, शैव दमनकारी योद्धाओं के अतिरिक्त अन्य किसी को भी भगवान कहकर संबोधित नहीं किया गया है !

सरल शब्दों में यदि कहा जाए तो शैव जीवन शैली में प्रत्येक व्यक्ति को यह अवसर है कि वह ईश्वर बन सकता है, लेकिन वैष्णव जीवन शैली में भगवान जन्म से पैदा होता है ! कोई भी व्यक्ति पुरुषार्थ द्वारा भगवान नहीं बन सकता है ! यही अंतर है वैष्णव के श्री और हमारे तत् संबोधन में !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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