धूर्त पदाधिकारियों से इंग्लैंड ने अपनी रक्षा कैसे की : Yogesh Mishra

साम्राज्यवाद की दौड़ में भारत को जीत लेने के बाद भारत के मूल चरित्र पर जब इंग्लैंड के समाजवादियों ने चिंतन किया तो यह पाया कि भारत का सामाजिक ढांचा इतना विकृत है कि यहां पर आने के बाद इंग्लैंड का मूलनिवासी जो भारत में पदाधिकारी के तौर पर नियुक्त किया जाता है, वह भी चारित्रिक रूप से पतित हो जाता है कि वह व्यक्ति इंग्लैंड के समाज के लिये भी एक समस्या बन जाता है !

इसीलिए भारत में सेवा करने वाले ब्रिटिश अधिकारियों को इंग्लैंड लौटने के बाद उन्हें कोई सार्वजनिक पद या प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं दी जाती थी ! उसके पीछे तर्क यह था कि आपने एक गुलाम राष्ट्र पर शासन किया है जिससे आपके दृष्टिकोण और व्यवहार में अंतर आ गया है ! अत: अब आप इंग्लैंड के लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं रहा गये हैं !

क्योंकि उस समय भारत के प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड से भेजे गये अंग्रेज पदाधिकारियों को धूर्तता, बेईमानी, मक्कारी से भारत के राजाओं को अपने नियंत्रण में रखना पड़ता था ! जिससे भारत के प्राकृतिक संसाधनों पर ब्रिटिश द्वारा नियंत्रण किया जा सके !

 क्योंकि उस समय यूरोप के सभी उद्योग धंधे अपने कच्चे माल के लिये भारत के प्राकृतिक संसाधनों पर ही निर्भर थे और भारत में कार्य न करने की प्रवृत्ति के कारण भारत का आम आवाम अपने कच्चे माल का उद्योगक सदुपयोग नहीं कर पा रहा था !

क्योंकि भारत के नागरिकों की मूल प्रवृत्ति कृषि द्वारा उत्पन्न सामग्री को बेचकर व्यापार करने की थी ! न कि तत्कालीन आधुनिक यंत्रों द्वारा किसी उद्योग को स्थापित और विकसित करने की थी !

इसका कारण यह है कि भारत सदैव से कृषि प्रधान देश रहा है ! जिसमें भारत वर्ष में मात्र 4 महीने कार्य किया जाता है ! शेष 8 महीने भारत का आम नागरिक पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन, तीज-त्यौहार, मौज-मस्ती आदि में बिताता है !

 भारत की प्राकृतिक अवस्था कृषि के इतने अनुकूल है कि बिना किसी अतिरिक्त परिश्रम के प्रकृति के सहयोग से निर्वाह योग्य पर्याप्त खाद्य सामग्री प्राप्त हो जाती है ! अत: पीढ़ियों से भारत के आम आवाम ने मेहनत करना ही छोड़ दिया था !

 इसी वजह से भारत में 2 वर्ग का विकास हुआ ! एक वह जो बुद्धिमान था ! अत्यंत संपन्न और विकसित वर्ग ! जिन्हें राजा, जमींदार, मुखिया आदि कहा जाता था और दूसरा वह वर्ग जो समाज के लिये परिश्रम करता था ! जिन्हें श्रमिक वर्ग कहा गया !

 स्वाभाविक रूप से श्रमिक वर्ग की संख्या किसी भी देश में निश्चित ही ज्यादा होती है और श्रमिक वर्ग का एक मात्र उद्देश्य परिश्रम के बदले धन प्राप्त करना होता है ! उनमें किसी भी तरह की राष्ट्रभक्ति या समर्पण की भावना इसीलिए विकसित नहीं हो पाती है क्योंकि वह सदैव अपने परिश्रम के बदले धन प्राप्त करने तक का ही दृष्टिकोण रखता है !

 इसी वजह से भारत में जो ब्रिटिश पदाधिकारी नियुक्त किये जाते थे ! वह भारत के श्रमिक वर्ग से प्राप्त सेवाओं के कारण इतने आलसी और अय्याश हो जाते थे कि उन्हें वापस इंग्लैंड लौटने पर इंग्लैंड की शासन व्यवस्था द्वारा किसी भी महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त नहीं किया जाता था !

जिससे इन आलसी और अय्याश प्रशासनिक अधिकारियों के कारण इंग्लैंड का आम आदमी भी इनका अनुकरण करके आलसी और अय्याश न हो जाये क्योंकि आलस्य और अय्याशी ही सभी सामाजिक भ्रष्टाचार का कारण है ! जिससे किसी भी स्वस्थ समाज में सैकड़ों तरह की विकृतियां पैदा होती हैं !

 इंग्लैंड के समाजवादी चिंतकों के इसी दर्शन के कारण इंग्लैंड में भारत से वापस जाने वाले पदाधिकारियों को इंग्लैंड के प्रशासनिक पद पर नियुक्त नहीं किया जाता था ! इस सावधानी के कारण इंग्लैंड का निरंतर विकसित होता चला गया और भारत अपना सर्वनाश कर बैठा !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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