नंदी का तात्पर्य बैल नहीं है : Yogesh Mishra

सुमेरियन, बेबीलोनिया, असीरिया और सिंधु घाटी की खुदाई में भी बैल की मूर्ति पाई जाती है जिसे शिव भक्त प्राय: नंदी कह देते हैं ! जबकि नंदी बैलों में एक ब्राण्ड मात्र है ! जिसके नश्ल सुधार का काम बनारस के शिलाद ऋषि के पुत्र नंदी ने भुवन नदी के तट पर किया था !

जब नंदी को वैदिक ऋषि मित्र और वरुण के द्वारा यह पता चला कि वह अल्प आयु है तो उसने अपने मृत्यु के बाद भी उसका नाम चलता रहे इस हेतु सम्पूर्ण विश्व में कृषि में प्रयोग किये जाने वाले बैल के अन्दर नश्ल सुधार कर के विशेष किस्म का उन्नत बैल बनाने का निर्णय लिया ! जिससे मृत्यु के बाद भी उसका नाम चलता रहे और उस उन्नत किस्म के बैल को अपने नाम पर नंदी ब्राण्ड नेम दिया !

किन्तु चमत्कार तब हुआ जब लम्बे समय तक निरंतर गोवंश की सेवा करने पर नंदी की जीवनी ऊर्जा में विकास होना शुरू हो गया और वैदिक ऋषि मित्र और वरुण आदि के द्वारा बतलाया गया मृत्यु का समय बीत गया और नंदी की मृत्यु नहीं हुई !

तब समाज ने उसे भी मार्कंडेय ऋषि को तरह मृत्युंजय घोषित कर दिया ! तब नंदी ने अपनी मेधा शक्ति से अनेक ग्रंथों की रचना की ! कामशास्त्र, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र आदि अनेक ग्रथों के रचनाकार नंदी जी ही थे।

उनके ज्ञान से प्रभावित होकर उन्हें शिव भक्तों ने शिव के प्रथम गण के रूप में माना उअनके अलावा शिव के अन्य गण भी हुये भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय आदि ! पर नंदी जैसा विद्वान् कोई नहीं हुआ !

इसीलिये पहले प्रत्येक शिव मन्दिर पर एक उन्नत नश्ल का नंदी ब्राण्ड का बैल गाँव की गायों के प्रजनन के लिये छोड़ दिया जाता था ! किन्तु नंदी ब्राण्ड का बैलों का समाज में आभाव होने पर कालांतर में नंदी ब्राण्ड के बैल की जगह शिवाला पर बैल की मूर्ति रखने का चलन शुरू हो गया जिसे नंदी कहा जाने लगा !

नंदी ने बैल के अलावा भैंसा के नश्ल सुधार कर भी काफी काम किया किन्तु कृषि में क्योंकि बैल का प्रयोग अधिक होता था ! अत: नंदी जी को बैलों के नश्ल सुधार से जोड़ कर अधिक देखा गया !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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