नई विश्व व्यवस्था में कृतिम भुखमरी का दुष्चक्र

आने वाले समय में अन्न पर पहला हक़ रोटी, शराब और पेट्रोल में किसका होगा ! जैसा कि फोटो से स्पष्ट है कि गोदामों में अनाज सड़ता नहीं बल्कि किसी के इशारे पर जानबूझ कर खाने का अनाज सड़वाया जाता है ! पर क्यों और कौन करवाता है यह सब !

यह सुनकर आपको अटपटा लग सकता है कि अनाज का सम्बन्ध आज रोटी से ज्यादा शराब और पेट्रोल से है ! क्योंकि नई विश्व व्यवस्था में जिस तरह अन्न के उपयोग की प्राथमिकतायें बदल रही हैं ! उसके चलते एक नया परिदृश्य उभरकर सामने आ रहा है ! अमेरिका और यूरोपीय संघ अन्न को ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोत के रूप में देख रहे हैं, वहीं भारत समेत कई विकासशील देशों में तेजी से बढ़ते शराब उद्योग के निशाने पर भी गरीबों का भोज्य अन्न ही है ! आने वाले दिनों में अन्न का बड़ा हिस्सा आटा चक्कियों में पहुंचने की बजाय डिस्टलरीज और ‘इथनॉल’ उत्पादन करने वाले प्लांट्स की भट्ठियों में पहुंचेगा ! धीरे-धीरे ही सही पर स्थितियां जिस तरह बदल रही हैं वह हैरान कर देने वाली हैं !

आपको याद होगा ! कुछ साल पहले महाराष्ट में जब ग्रेन(अन्न) से लिकॅर बनाने वाली डिस्टलरियों के लायसेंस रेवड़ी की तरह बांटे गए तो बड़ा हंगामा हुआ था ! अखबारों की सुर्खियां बनी खबरें समय के साथ हाशिए पर आ गर्इं पर अकेले महाराष्ट्र में पचास से ज्यादा डिस्टलरीज हैं जो अन्न (गेंहू, जौ, मक्का आदि) के फर्मन्टेशन से शराब बना रही हैं ! अपने देश की स्थितियों पर ही विचार करें, तो एसोचैम के अनुसार भारत में शराब की खपत 30 प्रतिशत सालाना के हिसाब से बढ़ रही है !

शराब की मौजूदा खपत 67,00 मिलियन लीटर, 2018तक बढ़कर 21 हजार मिलियन लीटर प्रतिवर्ष हो जायेगी ! आने वाले चार वर्षों के भीतर शराब के कारोबार का आकार लगभग दूना 1.4 लाख करोड़ का हो जायेगा ! शराब उद्योग के लिए अन्न सबसे सहज और सुलभ कच्चा माल है ! जाहिर है शराब की खपत के साथ अन्न उत्पादन का बड़ा हिस्सा शराब की भट्ठियों में सड़ने के लिए जायेगा ! फर्ज करिए पन्द्रह रुपये किलो गेंहू के फर्मन्टेशन से यदि डेढ़ सौ रुपये की शराब बनती है तो मुनाफे का धंधा रोटी होगी कि शराब !

विश्व सत्ता का आज अन्न से ही इथनॉल बनाने पर सबसे अधिक जोर है ! इस इथनॉल को वैज्ञानिकों ने पेट्रोल के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है ! कई यूरोपीय देशों में इथनॉल का उपयोग भी शुरू हो गया है ! इथनॉल इथाइल एल्कोहल का शोधित रूप है ! इथाइल एल्कोहल का सबसे बड़ा स्त्रोत ग्रेन है ! इसके फर्मन्टेशन से यीस्ट (खमीर), प्राकृतिक शर्करा को एल्कोहल में बदल देते हैं, यही एल्कोहल इथनॉल के रूप में पेट्रोल का विकल्प बनता है और वाहनों में इसका उपयोग शुरू हो चुका है !

खाड़ी देशों की अस्थिरता और प्राकृतिक पेट्रोलियम के सूखते स्त्रोतों ने वैज्ञानिकों को वैकल्पिक र्इंधन की खोज के लिए मजबूर किया है ! यूरोपियन यूनियन और अमरीका की सबसे बड़ी चिंता यही है कि खुदा न खास्ता पेट्रोलियम देश जो ज्यादातर अरब व अफ्रीका के मुस्लिम बहुल व शासित हैं, एक हो जायें तो क्या स्थिति बनेगी ! इसी स्थित से निपटने के लिए खाद्य प्रबंधन की नई रणनीति को गुप-चुप तरीके से अंजाम दिया जा रहा है ! शाकाहार के बदले मांसाहार का विकल्प प्रस्तुत किया जा रहा है ! दुर्भाग्य से आधुनिकता की चकाचौंध में अपना देश भी इस दुश्चक्र में फंसता और धंसता जा रहा है !

इससे सिद्ध होता है कि हम कृतिम भुखमरी के दुष्चक्र में फंस चुके हैं ! अपने देश में खान-पान की बदलती प्रवृत्तियों की सर्वे रिपोर्ट और आंकड़े जहां यूरोपीय समुदाय को खुश करने वाले हैं वहीं हमे हैरान व व्यथित करते हैं ! यूएन फूड एण्ड एग्रीकल्चर आर्गनाईजेशन (एफएओ) के अनुसार भारत में मीट की खपत 5.0 से 5.5 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष है ! इसकी ग्रोथ रेट 30 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है ! एफएओ की रिपोर्ट कहती है कि भारतीय अपनी पारंपरिक खान-पान की आदतों को बदलते हुए मांसाहार की ओर तेजी से उन्मुख हो रहे हैं ! ऐसे में यहां नए रेस्टोरेंट श्रृंखलाओं को कारोबार जमाने के लिए अकूत संभावनाएं हैं ! 2018 तक भारतीय खाद्य बाजार का कारोबार 400 बिलियन यूएस डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है !

महानगरों में यूरो-अमेरिकी रेस्त्राओं की श्रृंखला तेजी से बढ़ी है ! केएफसी(कन्टुकी फ्रायड चिकेन), मैकडोनाल्ड और इटैलियन पिज्जा हट का कारोबार प्रति वर्ष दुगुना होता जा रहा है ! राजधानी नई दिल्ली की स्थिति तो यह है कि किसी स्तरीय रेस्टोरेंट में वेजेटेरियन थाली नॉनवेज थाली से डेढ़ गुना महंगी है ! आप अपने शहर के कॉफी हाउस को भी मिशाल के तौर पर लें तो यहां एग करी  45 रुपये में उपलब्ध है जबकि एक प्लेट दाल 65 से 75 रुपये के बीच ! क्या यह आंकड़ा आपको हैरान करने वाला नहीं कि अपने देश में 2006 में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन अन्न की उपलब्धता 445.3 ग्राम थी जो 2011 में घटकर 436 ग्राम हो गई है !

हाल ही में संपन्न हुई देहली सस्टेनेवल डवलपमेंट सम्मिट में ये आंकड़े पेश किए गए हैं ! यानी कि कुल मिलाकर प्रति व्यक्ति मांस की खपत बढ़ रही है और अन्न की घट रही है ! जाहिर है कि यह घट-बढ़ और तेज होगी ! क्योंकि अन्न रोटी से ज्यादा शराब और पेट्रोल के लिए काम आने वाला जिन्स है !

बदलाव हमारी व्यवस्था में हो, प्रवृत्तियों में या सभ्यता-संस्कृति में आहिस्ते-आहिस्ते होता है ! हम जब तक समझ पाते हैं देर हो चुकी होती है, सब कुछ गवां चुके  होते हैं ! स्कूल के दिनों में एक दिलचस्प वैज्ञानिक प्रयोग के बारे में सुना था ! ‘खौलते हुए पानी में मेंढक को डालेंगे तो वह उछल कर बाहर आ जायेगा, किन्तु तैरते हुए मेंढक के साथ ठण्डे पानी को मंद आंच में रखेंगे, तो मेढक उछल कर बाहर नहीं आयेगा, अपितु क्रमश: बढ़ते हुए ताममान में वह खुद पक जायेगा’ किसी भी बदलाव को इस प्रयोग की नजीर के साथ समझा जा सकता है ! हिन्दुस्तान ऐसे ही दौर से गुजर रहा है ! नई विश्व व्यवस्था इसी अंदाज में आगे बढ़ रही है !

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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मोबाईल : 9453092553

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