‘नौकरी’ शब्द की उत्पत्ति ही ‘नौकर’ शब्द से हुई है। यह विडंबना है कि आज का शिक्षित युवा जिस चीज के पीछे सबसे ज्यादा भाग रहा है, उसका शाब्दिक अर्थ ‘सेवादार’ या ‘गुलाम’ होना है।
मैकाले की शिक्षा पद्धति ने भारतीय मस्तिष्क को गुलाम बनाने के लिये यह बात दिमाग में गहराई तक बिठा दी है कि आर्थिक सुरक्षा ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है, जबकि वास्तविकता यह है कि आर्थिक सुरक्षा के नाम पर नौकरी एक “सुनहरे पिंजरे” से ज्यादा कुछ नहीं है।
क्योंकि जब आप नौकरी करते हैं, तो आप केवल अपना समय नहीं बेचते, बल्कि अपनी स्वतंत्रता और संभावनाओं को भी गिरवी रख देते हैं।
क्योंकि जब आप नौकरी करते हैं, तो आपकी कीमत आप नहीं, कोई और तय करता है। यदि आपके अंदर 1 करोड़ का काम करने की क्षमता है, लेकिन बॉस आपको 50 हजार दे रहा है, तो बाकी 99 लाख 50 हजार का घाटा आप हर महीने उठा रहे हैं। इस विषय पर गंभीरता से विचार कीजिये !
धीरे धीरे आपका मानसिक दायरा बहुत सीमित होता चला जाता है ! आप के पूर्वजों ने “अहम् ब्रह्मास्मि” का उद्घोष किया और अपने भीतर की अनंत ऊर्जा से सृष्टि का संचालन किया और एक आप हैं कि ‘बॉस’ के डर से और ‘सैलरी’ के लालच में अपनी प्रतिभा और दिव्य आत्म ऊर्जा का अपमान कर रहे हैं !
और साथ ही तनाव के कारण अपने स्वास्थ्य को किसी ऐसे के लिये नष्ट कर देते हैं, जिसका कोई लाभ आपको या आपके परिवार को नहीं मिलता है ! एक नौकर का बेटा अगर नौकरी करता है तो उसे अपना जीवन शून्य से शुरू करना होता है, जबकि मालिक का बेटा वहां से आगे बढ़ता है जहाँ तक पिता ने काम को बढ़ा कर छोड़ा था !
अब प्रश्न यह है कि हम क्या करें ? होगी।
आज के डिजिटल युग में ‘स्व-उद्यम’ आपके लिये सबसे बड़ा विकल्प है !
अपनी तथाकथित डिग्री को भूलकर अपने ‘कौशल’ को पहचानें और उसका प्रयोग करें। चाहे वह लेखन हो, कोडिंग हो, ज्योतिष हो, कुकिंग हो, काउंसलिंग हो आदि आदि।
आज इंटरनेट के माध्यम से आप अपनी कला या कौशल को सीधे दुनिया को बेच सकते हैं, बिना किसी बिचौलिए के यह आपके लिये इस युग का सबसे बड़ा वरदान है !
नौकरी अचानक मत छोड़िये, रिस्की हो सकता है, इसलिए शुरुआत ‘साइड बिजनिस’ को शुरू कीजिये। अपनी नौकरी के साथ-साथ शाम को 2-3 घंटे अपने खुद के प्रोजेक्ट पर नियमित समय दीजिये। जब आपकी ‘साइड इनकम’ आपकी ‘सैलरी’ से ज्यादा हो जाए, तब उस पिंजरे को त्याग दीजिये।
यदि कोई छोटा मोटा पैतृक व्यापार है, तो उसे भी करने में शर्म मत कीजिये। बल्कि उसके विस्तार की निरंतर योजना बनाइये ! किसी और के ऑफिस में फाइल खिसकाने से बेहतर है कि अपनी खुद की दुकान पर पसीना बहाइये। क्योंकि वहां आप ‘स्वामी’ हैं, किसी के नौकर नहीं हैं।
रिस्क लेने से डरना बंद करें। याद रखें, एक जहाज बंदरगाह पर सबसे सुरक्षित होता है, लेकिन वह वहां खड़े रहने के लिए नहीं बना होता। जीवन का उद्देश्य ‘सुरक्षित’ रहना नहीं, बल्कि ‘सफल’ और ‘स्वतंत्र’ होना है। नौकरी की मानसिकता त्यागें और ‘उद्यमी’ बनें, क्योंकि राष्ट्र का निर्माण ‘नौकर’ नहीं, ‘मालिक’ करते हैं।
और आप भी बस मानसिकता बदल कर मालिक बन सकते हैं !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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