पृथ्वी का संचालन हिमालय की दिव्य संतों की ऊर्जाओं से ही होता है !

धरती पर ऊर्जा के दो केंद्र हैं ! देव ऊर्जाओं के लिये हिमालय और आसुरी ऊर्जाओं के लिये साऊथ इस्ट एशिया ! दोनों के इस पृथ्वी पर समान अधिकार है ! हिमालय की ऊर्जाओं के आचार्य वृहस्पति हैं और साऊथ इस्ट एशिया की ऊर्जाओं के आचार्य शुक्राचार्य जी हैं ! एक ऊंचाई की पराकाष्ठा पर है तो दूसरे सागर तल के निकट ! एक जगह हरियाली है तो दूसरी जगह रेगिस्तान ! एक जगह झरने हैं तो दूसरी तरफ रेत का दरिया ! एक तरफ साधना होती है तो दूसरी तरफ अनंत काल से संघर्ष ! फिर भी बात आज हम दिव्य साधना के केन्द्र हिमालय की करते हैं !

हिमालय की दुर्गम पर्वत श्रंखलाओं में ऐसी ही करोड़ों सूक्ष्म शरीरधारी दिव्य आत्माओं निवास करती हैं ! जो अपने स्थूल शरीर को छोड़कर सूक्ष्म शरीर से मानसिक शक्तियों द्वारा ईश्वर का कार्य कर रही हैं ! सामान्यत: यह आत्मायें अपनी तप साधनाओं में लीन रहती हैं !  

परन्तु जब धरती पर बहुत विषम पस्थितियां होने लगती हैं ! और धरती पर निवास कर रहे महापुरुषों, सन्तों, वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों, विचारकों के नियन्त्राण से बाहर होने लगती हैं ! तब यह आत्मायें धरती की समस्याओं को सुलझाने के लिये जागृत और क्रियाशील होने लगती हैं !

यह आत्मायें उस समय धरती पर उभर रहे भयावह वातावरण को समाप्त करने के लिये अच्छे मनुष्यों के साथ मिल कर संयुक्त प्रयास प्रारम्भ कर देती हैं ! उनके इस स्वरूप को ही शास्त्रों में ऋषि संसद की संज्ञा दी जाती है !

तब यह आत्मायें धरती की भीषण समस्याओं के निराकरण के लिये तरह-तरह की योजनायें बनाना प्रारम्भ कर देती हैं ! इन योजनाओं को क्रियान्वित  करने के लिये इन्हें स्थूल शरीरधारी व्यक्तियों की आवश्यकता होती है ! अत: यह धरती पर उन मानवों से सम्पर्क करती हैं जो अच्छे हृदय के होते हैं ! जिनकी अपनी इच्छायें, वासनायें,लालसायें कम होती हैं तथा मानव जाति के कल्याण के लिये जिनका हृदय सदैव द्रवित रहता है !

तात्पर्य यह है कि हिमालय में देव ऋषियों का एक समूह है ! जो वस्त्र व भोजन से रहित है ! न तो उन्हें भोजन की आवश्यकता है न वस्त्रो की ! इन्हें देवर्षियों कहते हैं ! यह सबसे अधिक आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न होते हैं ! यह स्थूल शरीर के झंझट से परे व समाज से अलग रहकर हिमालय में ही रहते हैं !

असली ऋषि हिमालय से कभी नहीं आते हैं ! कुम्भ आदि में भी नहीं क्योंकि उनके आने की कोर्इ सार्थकता नहीं है ! कुम्भ आदि में आयी जनता भी अधिकांश कौतूहल के लिये ही आती है ! जहाँ इनके आने का कोई मतलब नहीं है ! देव ऋषियों का यह वर्ग ही भारत को अधर्म, पाप, पीड़ा, अज्ञानता से छुड़ाता है !

यह वर्ष 2020 से लेकर 2050 तक भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व के कायाकल्प के लिये कटिबद्ध है ! इनकी दिव्य ऊर्जा से पृथ्वी के सभी पापी स्वत: ही पृथ्वी छोड़कर चले जायेंगे और पुनः सतयुग का आगमन होगा ! इसी समय असुरी शक्तियां भी इन्हीं के प्रभाव से दो पक्ष बना कर आपस में लड़ेंगी और आपस में ही लड़ कर नष्ट हो जायेंगी !

भौतिक रूप से देखा जाये तो सूक्ष्म शरीर के संकल्प मात्र से होने वाले इस तृतीय विश्व युद्ध के लिये पूरे विश्व की आसुरी शक्तियां दो हिस्सों में धर्म के आधार पर बंट जायेंगी ! एक हिस्सा वह होगा जो इस्लाम का नेतृत्व करेगा और दूसरा हिस्सा वह होगा जो ईसाइयत का नेतृत्व करेगा अर्थात हिंदुओं की भूमिका इस पूरे के पूरे युद्ध में मात्र देव ऊर्जाओं को पोषण करने की है ! बाकी शेष सभी कार्य ईश्वर की इच्छा पर हिमालय के अंदर निवास करने वाले सूक्ष्म शरीर के देव ऋषि गण स्वत: करेंगे ! और विस्तृत जानकारी के लिये मेरे दूसरे लेख पढ़िये !

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

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