आध्यात्मिक पवित्रता, मोक्ष या उच्च चेतना के नाम पर शिष्यों के गुप्तांग काटने या नपुंसक बनाने की परंपरा विश्वव्यापी है !
18वीं से 20वीं शताब्दी के मध्य रूसी चरमपंथी संप्रदाय में समय-समय पर हजारों अनुयायियों ने इस प्रथा को अपनाया था।
इनका अंधविश्वास था कि इंसान के यौन अंग ‘मूल पाप’ का प्रतीक हैं। पूर्ण आध्यात्मिक पवित्रता और स्वर्ग की प्राप्ति के लिए पुरुष अपने गुप्तांग काट लेते थे, जबकि महिलाएं अपने वक्ष कटवा लेती थीं।
अमेरिका के मार्शल एप्पलवाइट ने भी पंथ के प्रमुख मार्शल सहित लगभग 8 पुरुष सदस्यों ने सर्जिकल तरीके से अपने गुप्तांग कटवा लिए थे।
राम रहीम के डेरा सच्चा सौदा में 400 शिष्यों के गुप्तांग काटे गये ! यह गुरु और ईश्वर के प्रति समर्पण करना माना जाता है !
आध्यात्मिक उन्नति, मोक्ष और ईश्वर दर्शन के नाम पर कुछ पाखंडी आश्रम संचालकों ने शोषण के ऐसे क्रूर तंत्र विकसित किए हैं, जो मानवता और धर्म दोनों को कलंकित करते हैं। शिष्यों को शारीरिक रूप से अक्षम या नपुंसक बना देना इसी भयानक षड्यंत्र का एक चरम बिंदु है।
धर्म की आड़ में किए जाने वाले इस अमानवीय कृत्य के पीछे कोई पारलौकिक रहस्य नहीं, बल्कि स्वयंभू भगवानों का गहरा भौतिक लालच, सत्ता की भूख और एकाधिकार की कुत्सित भावना छिपी होती है।
इस कृत्य का सबसे प्राथमिक उद्देश्य शिष्यों पर पूर्ण मानसिक और शारीरिक नियंत्रण स्थापित करना होता है। जब किसी व्यक्ति के शरीर का यह अंग भंग कर दिया जाता है, तो उसके भीतर एक गहरी मनोवैज्ञानिक ग्रंथि और समाज से अलगाव की स्थिति पैदा हो जाती है। वह सामान्य पारिवारिक जीवन जीने के योग्य नहीं रहता।
इस अक्षमता का लाभ उठाकर पाखंडी गुरु उसे यह भ्रम देते हैं कि उसने वासना पर विजय प्राप्त कर ली है और ईश्वर के लिए सर्वोच्च त्याग किया है। इसके परिणामस्वरूप, शिष्य की चेतना कुंठित हो जाती है और उसकी स्वतंत्र विचार क्षमता पूर्णतः समाप्त हो जाती है। वह आजीवन के लिए एक वैचारिक गुलाम बन जाता है।
आश्रम के मालिकों को इस दासता से असीमित आर्थिक लाभ प्राप्त होता है। जिस व्यक्ति का अपना कोई परिवार, पत्नी या भावी संतान नहीं होती, उसकी जीवन भर की कमाई, पैतृक संपत्ति और उसकी संपूर्ण ऊर्जा का एकमात्र उत्तराधिकारी वह आश्रम ही बन जाता है। पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने के कारण ऐसे हजारों शिष्य दिन-रात बिना किसी पारिश्रमिक के आश्रम के लिए श्रम करते हैं।
यह मुफ्त का श्रम आश्रमों के विशाल आर्थिक साम्राज्य की नींव रखता है। एक तरह से यह आधुनिक युग की बंधुआ मजदूरी है, जिसे धर्म का आवरण पहना दिया गया है।
समाज से पूर्ण अलगाव इस शोषण-चक्र को और अधिक मजबूत करता है। अंग-भंग की प्रक्रिया के पश्चात, शिष्य चाहकर भी मुख्यधारा के समाज या अपने पुराने परिवेश में नहीं लौट पाता। उसे अपनी स्थिति पर ग्लानि होती है और वह केवल आश्रम की चारदीवारी के भीतर ही खुद को सुरक्षित अनुभव करता है। गुरु इसी सामाजिक असुरक्षा और मजबूरी का दोहन करते हैं और उन्हें आजीवन अपने अधीन रखते हैं।
इन शोषित शिष्यों के माध्यम से आश्रम संचालक एक ऐसी कट्टर फौज तैयार करते हैं, जो अपने गुरु की रक्षा और उसके आदेशों के पालन के लिए किसी भी सीमा को पार कर सकती है। चूँकि इन शिष्यों का अस्तित्व केवल आश्रम पर निर्भर होता है, वे गुरु को ही अपना सर्वस्व मान बैठते हैं।
यह अंधी भीड़ आश्रम संचालकों को समाज, प्रशासन और कानून के समक्ष शक्ति प्रदर्शन का एक अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान करती है।
आस्था के नाम पर किया जाने वाला यह कृत्य मात्र एक शारीरिक अपराध नहीं है, बल्कि यह मानवीय चेतना और गरिमा की निर्मम हत्या है। यह इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि जब धर्म का व्यापारीकरण होता है, तो वह किस प्रकार मनुष्य को उसके ही मूल अधिकारों और नैसर्गिक अस्तित्व से वंचित कर देता है।
सच्ची आध्यात्मिकता मनुष्य को मुक्त करती है, जबकि यह पाखंड उसे आजीवन बेड़ियों में जकड़ लेता है। समाज को इस अंधी दासता से मुक्त होकर धर्म के सच्चे स्वरूप को पहचानने की आवश्यकता है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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