प्रकृति की अपनी एक स्वचालित और संतुलित व्यवस्था है, जहाँ प्रत्येक कार्य का एक निश्चित कारण और परिणाम होता है। जब कोई व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के प्रदर्शन के लिए भंडारे का आयोजन करता है, तो वह अनजाने में प्रकृति के कई मूल नियमों का सीधा उल्लंघन करता है, जिसका अंतिम परिणाम दरिद्रता के रूप में सामने आता है।
प्रकृति में हर जीव को उसकी क्षुधा (भूख) के अनुसार ही भोजन की व्यवस्था है। कोई भी जंगली प्राणी न तो आवश्यकता से अधिक संचय करता है और न ही बिना कारण किसी अन्य को भोजन बांटता है।
भंडारे में प्रायः वह लोग भोजन ग्रहण करते हैं, जो वास्तव में भूखे नहीं होते या जिनके पास स्वयं भोजन जुटाने की सामर्थ्य होती है। तृप्त व्यक्ति को खिलाना या बिना आवश्यकता के संसाधनों का वितरण करना प्रकृति के ऊर्जा संतुलन के सर्वथा विरुद्ध है।
प्रकृति ऊर्जा के इस असंतुलन का दंड व्यक्ति की अपनी संचित ऊर्जा (धन और भाग्य) को नष्ट करके देती है।
प्रकृति का यह कठोर नियम है कि प्रत्येक जीव को अपने भोजन के लिए कर्म या श्रम करना ही पड़ता है। एक चींटी से लेकर हाथी तक, सभी अपना भोजन खोजते हैं। जब कोई व्यक्ति भंडारे के माध्यम से निःशुल्क भोजन बांटता है, तो वह समाज में अकर्मण्यता, आलस्य और प्रमाद को जन्म देता है।
दूसरों के पुरुषार्थ को रोकने या उन्हें बिना श्रम के भोजन देकर पंगु बनाने का यह सूक्ष्म पाप आयोजक के कर्मों में जुड़ता है। प्रकृति इस व्यवस्था-भंग के दंड स्वरूप आयोजक के ही सौभाग्य को क्षीण कर देती है।
प्रकृति में किसी भी संसाधन का निर्माण बहुत लंबी और जटिल प्रक्रिया से होता है। एक दाना अन्न उगने में सूर्य, जल, पृथ्वी और वायु की अपार ऊर्जा लगती है। भंडारे के विशाल आयोजनों में अनिवार्य रूप से अन्न का भारी अपव्यय, जूठन और अपमान होता है।
प्रकृति अपने संसाधनों के इस निरर्थक और अहंकारपूर्ण विनाश को कभी स्वीकार नहीं करती। अन्न का यह अपमान सीधे तौर पर भविष्य में भुखमरी और दरिद्रता को आमंत्रित करता है।
संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल प्रकृति (ईश्वर) ही एकमात्र वास्तविक पालनकर्ता और अन्नदाता है। जब मनुष्य अपने धन के मद में यह मान लेता है कि “मैं इतने लोगों का अन्नदाता हूँ”, तो वह अपने अहंकार में प्रकृति की सर्वोच्च सत्ता को चुनौती देता है।
प्रकृति किसी भी जीव के इस ‘कर्तापन के दंभ’ को सहन नहीं करती। व्यक्ति के भीतर पनपे इस ईश्वरत्व के झूठे अहंकार को तोड़ने के लिए, प्रकृति उसे कालान्तर में ऐसी दरिद्रता में धकेल देती है जहाँ उसे अपनी वास्तविक औकात और क्षुद्रता का बोध हो सके।
प्रकृति का हर लेन-देन शून्य (संतुलन) पर समाप्त होना चाहिए। जब आप बिना किसी प्राकृतिक कारण के हज़ारों लोगों पर अपना अन्न थोपते हैं, तो ब्रह्मांड के बही-खाते में एक बहुत बड़ा और अकारण कर्म-ऋण बन जाता है। प्रकृति को यह असंतुलन स्वीकार नहीं है।
इस विशाल ऋण की भरपाई के लिए प्रकृति उस अभिमानी आयोजक को अगले जन्मों में अत्यंत दीन और दरिद्र अवस्था में जन्म देती है, ताकि जिन जीवों ने उसका अन्न खाया था, वह सभी उसे भिक्षा या निःशुल्क अन्न देकर अपना हिसाब चुकता कर सकें।
यही कारण है कि एकांत में किसी वास्तविक भूखे की सहायता करना प्रकृति के अनुकूल और मुक्तिदायक है, परंतु समाज में अपनी महानता सिद्ध करने के लिए किया गया भंडारा प्रकृति की मूल व्यवस्था पर एक प्रहार है, जो अंततः आयोजक को भीषण दरिद्रता के गर्त में ही गिराता है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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