प्राय: लोग बासा भोजन का मतलब पूर्व का बना हुआ भोजन ही समझते हैं ! लेकिन बासा भोजन का अर्थ इससे गहरा है !
क्या आपने कभी सोचा है कि पूर्वजों की विरासत पर जीवन बिताना असल में कैसा होता है? भोजन के दृष्टिकोण से देखें तो एक गहरा सत्य सामने आता है, “पूर्व के कमाए हुए धन से बनाया गया भोजन भी बासा ही होता है।” यह कथन केवल रसोई के बचे हुए अन्न की बात नहीं, बल्कि मानवीय श्रम और आत्मसम्मान का दार्शनिक सच है।
भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि उस ऊर्जा का प्रतीक है जिससे वह कमाया गया है। आज की मेहनत और पसीने से कमाए धन में एक जीवंतता होती है। शाम को अपने संघर्ष से चूल्हा जलाने वाले व्यक्ति के भोजन में संतोष की अलग ही महक होती है।
इसके विपरीत, पूर्वजों की संपत्ति ‘संचित’ धन है। जैसे रुका हुआ पानी सड़ जाता है, वैसे ही बिना नए पुरुषार्थ के केवल विरासत पर पलना जीवन में जड़ता लाता है। अतीत के श्रम से खरीदा गया आज का अन्न, वर्तमान के पसीने से हीन होने के कारण अपनी आत्मिक ताजगी खो देता है।
आयुर्वेद और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, ताजा भोजन ऊर्जा देता है, जबकि बासा भोजन आलस्य पैदा करता है। बिना मेहनत के मिली संपत्ति व्यक्ति के भीतर अकर्मण्यता और अहंकार भर देती है। प्रकृति का नियम हर पल सृजन का है, सूर्य रोज नया उगता है, नदियां नया जल बहाती हैं। मनुष्य जब पुरानी सफलताओं के सहारे निष्क्रिय होता है, तो वह इस प्रवाह को तोड़ देता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि पैतृक धन बुरा है। फर्क इसके उपयोग की मानसिकता में है। यदि इसका उपयोग केवल विलासिता में हो, तो वह ‘बासा भोजन’ है जो व्यक्ति को खोखला कर देगा। लेकिन यदि उसी पूंजी को ‘बीज’ मानकर उसमें अपने परिश्रम का पानी डाला जाए, तो वह पुनः ताजा और फलदायी बन जाता है।
सच्चा सुख विरासत की थाली में नहीं, अपनी कमाई सूखी रोटी में है। जीवन में स्वाभिमान बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि इंसान अतीत की बासी रोटी पर टिके रहने के बजाय, हर दिन अपने श्रम की अग्नि से अपना ताजा भोजन पकाए।
इस तरह सिद्ध होता है, पूर्व के कमाए हुए धन या पूर्वजों के पैसे से बनाया गया भोजन भी बासा भोजन होता है ।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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