भगवान का दर्शन बहुत आसान है : Yogesh Mishra

भगवान का दर्शन बहुत आसान है, बस व्यक्ति का चित्त कमजोर होना चाहिये ! इसीलिए वैष्णव भक्त लोग लंबे उपवास करके चित्त को कमजोर बना लेते हैं ! जिससे कि वह शास्त्रों के अनुरूप जो भी कल्पना कर चुके हैं उसे वह अनुभूत कर सकें !

लंबे उपवासों से व्यक्ति को मानसिक और शाररिक कमजोरी के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगता है ! लंबे और कठिन उपवास से कुछ समय बाद चित्त कमजोर होता है और चित्त के कमजोर हो जाने से व्यक्ति में तर्क वितर्क करने की क्षमता धीरे धीरे समाप्त हो जाती है !

इसीलिये वैष्णव साधना पध्यति में व्रत का बड़ा महत्व है ! भगवान का जन्म हुआ तो व्रत, भगवान का विवाह हुआ तो व्रत, पति की रक्षा करना है तो व्रत, बेटे को सफलता दिलानी है तो व्रत ! एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, तीज त्यौहार सभी समय बस व्रत ही है अर्थात कोई भी कार्य करना हो या धार्मिक प्रयोजन हो तो बस व्रत रहिये और अपने चित्त को कमजोर कीजिये !

अर्थात यह व्रत वैष्णव का भक्तों को तर्क विहीन करने का हथियार है ! जिसका इस्तमाल वैष्णव अनादि काल से करते चले आ रहे हैं ! क्योंकि कमजोर चित्त में जांचने परखने का समर्थ नहीं रखता है !

क्या सही है, क्या झूठ बोला जा रहा, इसका विश्लेषण किये बिना कमजोर चित्त का व्यक्ति सब कुछ वैसा ही स्वीकार कर लेता है, जैसा उसे समझाया जाता है ! इसीलिये व्रत का हर अंध अनुकरणीय धर्म में विशेष महत्व है ! क्योंकि यह कमजोर चित्त के व्यक्ति के लिये अपनी रूचि और जानकारी के अनुसार सपना देखना बहुत सरल बना देता है !

जिससे अपनी कल्पना और जानकारी के अनुसार भगवान को भी देखा और महसूस किया जा सकता है ! यही वैष्णव के भ्रम जाल अर्थात भगवत दर्शन का आधार है !

दूसरे शब्दों में कहा जाये तो एक अपोषित थका हुआ मन, शरीर और कमजोर चित्त भगवान के जल्दी दर्शन कर लेता है क्योंकि उसमें तर्क करने का सामर्थ नहीं होता है !

इसीलिये भगवान का साक्षात्कार करने के लिये बस एक निर्मल हृदय चाहिए, भगवान के स्वरूप की जानकारी चाहिये और कल्पनाशील अंधविश्वासी मन चाहिए ! इतने से भगवान के दर्शन किये जा सकते हैं ! यही पहाड़ पर या तीर्थ में 84 कोस परिक्रमा में भगवान के दर्शन का आधार है !

कमजोर चित्त लंबे उपवास और अपोषित भोजन से बनाया जा सकता है ! वैसे फिर वैष्णव आचार्यों के पास भी इसी तरह की और भी ऐसी ही बहुत सी तरकीबें हैं ! जैसे मन्दिर या आश्रम की सफाई करना, गौ सेवा करना, गुरु सेवा करना, सत्त अखंड ग्रन्थ पाठ करना, अखण्ड भजन करना या निर्जला व्रत का संकल्प लेना, दीर्घ कालिक लंबे उपवास रखना आदि आदि ! यह सभी कृत्य काल्पनाशील और कमजोर मन को पोषण और विश्राम के आभाव में और अधिक काल्पनिक और कमजोर बना देते हैं !

इस तरह कल्पना-प्रवीण मन लम्बे अभ्यास के बाद इमेजिनेटिव हो जाता है ! आपने भी अनुभव किया होगा कभी आपको अगर बुखार में लंघन करनी पड़े तो आपको पता चला होगा कि उस लंबी लंघन के कारण आपको भूखा रहना पड़ता है जिससे कमजोरी बढ़ जाती है और तरह तरह के आभास होने लगते हैं जैसे कभी खाट आकाश में उड़ती हुई मालूम पड़ती है तो कभी भूत-प्रेत, पिशाच चुड़ैल जिन्न आदि दिखने लगते हैं ! कभी कभी मरे हुये व्यक्ति दिखने लगते हैं !

ठीक इसी तरह कमजोर चित्त के व्यक्ति को कभी कभी अपनी कल्पना के अनुसार देवी-देवता भगवान आदि भी दिखने लगते हैं ! बस यही भागवत दर्शन का आधार है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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