आयुर्वेद और पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धतियाँ इस बात का सबसे जीवंत उदाहरण हैं कि कैसे चिकित्सा विज्ञान को स्थानीय जलवायु, मौसम और शरीर की प्रकृति के अनुसार ढाला जाना चाहिए।
आधुनिक पश्चिमी चिकित्सा विज्ञान जहाँ मुख्य रूप से एक आकार सभी के लिए के सिद्धांत पर काम करती है, वहीं आयुर्वेद पूरी तरह से स्थान, काल और व्यक्ति के अनूठे संतुलन पर आधारित है।
भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में वर्ष में तीन मुख्य ऋतुएं अपने चरम पर होती हैं, और अत्यधिक गर्मी के कारण शरीर अपनी ऊर्जा को तापमान नियंत्रित करने में लगाता है, जिससे जठराग्नि मंद पड़ जाती है।
इसके विपरीत आयुर्वेद ऋतुचर्या का विधान करता है, जिसके तहत गर्मियों में ठंडी तासीर वाले, हल्के और आसानी से पचने वाले खाद्य पदार्थों तथा छाछ या नींबू पानी का सेवन करने की सलाह दी जाती है, जबकि ठंडे देशों का भारी भोजन गर्म भारत में खाने पर एसिडिटी, अपच और क्रॉनिक इंफ्लेमेशन का कारण बन जाता है।
दवाओं और जड़ी-बूटियों का प्रभाव उनके सक्रिय यौगिकों और उनकी तासीर पर निर्भर करता है। भारत में पारंपरिक रूप से उपयोग होने वाले मसाले जैसे हल्दी, काली मिर्च, सोंठ और दालचीनी की प्रकृति उष्ण होती है, जो भारत के आर्द्र और मानसूनी मौसम के दौरान कफ और वात दोष को नियंत्रित कर पाचन तंत्र को सक्रिय रखते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।
यदि यही गर्म तासीर वाले मसाले ठंडे देशों में उपयोग किए जाएं, तो वे वहाँ की जलवायु के अनुसार शरीर को आंतरिक गर्ماहट और ऊर्जा देते हैं, लेकिन गर्म देशों में इनका अनियंत्रित उपयोग पित्त दोष को असंतुलित कर सकता है।
आयुर्वेद हर व्यक्ति की शारीरिक प्रकृति और उसकी भौगोलिक स्थिति के आधार पर औषधि का चयन करता है, क्योंकि यदि किसी गर्म क्षेत्र के व्यक्ति को ठंडे देशों के प्रोटोकॉल के अनुसार अत्यधिक उष्ण रसायन दिए जाएं, तो उसका पित्त दोष तुरंत असंतुलित हो जाएगा।
प्रकृति का यह नियम है कि जिस क्षेत्र में जो बीमारियां या संक्रमण होते हैं, ठीक उसी क्षेत्र की वनस्पति में उससे लड़ने के गुण मौजूद होते हैं।
भारत में मानसून के बाद होने वाली बीमारियां और उनके लिए गिलोय, नीम, तुलसी जैसी स्थानीय औषधियों का उपयोग इसका सबसे बड़ा प्रमाण है, जिनकी कड़वी और ठंडी प्रकृति शरीर के बढ़े हुए पित्त और संक्रमण को शांत करती है।
यदि इन स्थानीय जरूरतों को समझे बिना पश्चिमी देशों की किसी रासायनिक एंटीबायोटिक या सिंथेटिक ड्रग को भारतीय शरीर पर आंख मूंदकर लागू किया जाए, तो वह थोड़े समय के लिए राहत तो दे सकती है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से लिवर और आंतों के माइक्रोबायोम को नुकसान पहुंचाती है।
पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धतियां इस अकाट्य सत्य पर आधारित हैं कि मानव शरीर प्रकृति का ही एक लघु रूप है, और जिस प्रकार मौसम बदलने पर प्रकृति अपने जीने का तरीका बदल लेती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपनी स्थानीय जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार ही अपने खान-पान और चिकित्सा को ढालना चाहिए।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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