मूर्खों के देश में ज्ञान का शत्रु होना एक शाश्वत और कड़वा सच है। जिस समाज या व्यवस्था की नींव अज्ञानता, अंधविश्वास और संकीर्णता पर टिकी हो, वहाँ ज्ञान एक अभिशाप है।
जब कोई ज्ञानी व्यक्ति ऐसे समाज में प्रवेश करता है, तो वह अपने तर्कों और विवेक से उन पुरानी मान्यताओं पर सवाल उठाता है, जिन्हें लोग पीढ़ियों से सच मानते आए हैं। तब अज्ञानी और सत्तालोभी लोग अपने भ्रमित साम्राज्य को बचाने के लिए उस ज्ञानी व्यक्ति को समाज का सबसे बड़ा दुश्मन घोषित कर देते हैं।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ज्ञान समाज की कमियों और मूर्खता के मुखौटे को खींचकर उतार देता है। जिससे घबरा कर सत्तालोभी लोग अपनी हीनभावना और छद्म अहंकार को छिपाने के लिए ज्ञानी को ही अपराधी के कटघरे में खड़ा कर देते हैं।
इतिहास इस बात की गवाही देता है। सुकरात ने जब एथेंस के युवाओं को सोचना सिखाया, तो उन्हें विष का प्याला पीना पड़ा। गैलीलियो ने वैज्ञानिक सत्य रखा तो उन्हें प्रताड़ित किया गया। भारत में भी “अंधेर नगरी” जैसे प्रसंग मिलते हैं, जहाँ विवेक और मूर्खता का भेद मिटाकर ज्ञानी को ही दंडित किया जाता है।
संक्षेप में कहें तो, जहाँ अज्ञानता ही सुरक्षा और नियम बन जाए, वहाँ प्रकाश फैलाने वाला हर दीप चोरों और अंधकार के पुजारियों की आँखों में चुभने लगता है। यही कारण है कि मूर्खों के देश में ज्ञान व्यक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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