महर्षि बाल्मीकि का राम के प्रति आक्रोश : Yogesh Mishra

रामायण के लेखन प्रक्रिया को देख कर स्पष्ट पता चलता है कि महर्षि बाल्मीकि उत्तर कांड की रचना राम के राजनैतिक प्रभाव के कमजोर पड़ने के बाद की थी ! जिसमें तपस्वी शम्बूक की हत्या से लेकर श्रीराम द्वारा अपनी गर्भवती पत्नी देवी सीता को धोबी के कहने पर राज महल से निर्वासित करने का प्रकरण दर्ज है ! इस तरह सीता परित्याग की पूरी घटना वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड में मिलती है ! जो रामायण के लेखन को पूर्ण करने के कुछ समय बाद पुन: लिखा गया है !  

वाल्मीकि रामायण ही रामायण का वास्तविक और मूर्त रूप है, क्योंकि ऋषि वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे और कई घटनाओं के प्रत्यक्ष साक्षी भी थे ! इस लिये उनके लेखन के आधार पर घटना क्रम पर संदेह नहीं किया जा सकता है !

वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड का 128वां सर्ग कहता है कि श्रीराम राजा बन गये ! विभीषण लंका चले गये, सुग्रीव किष्किंधा लौट गये ! लक्ष्मण के स्थायी रूप से अस्वस्थ्य होने के कारण भरत सेनापति नियुक्त हो गये और इसके बाद श्लोक संख्या 95 से लेकर 106 तक में सभी के खुशी-खुशी रहने का वर्णन मिलता है ! 106वें श्लोक के बाद कथा की फलश्रुति अर्थात कथा सुनने के फल के लाभ का भी वर्णन मिलता है ! यह सभी धर्म ग्रंथों में अंतिम अध्याय के रूप में जाना जाता है ! इसका मतलब है कि औपचारिक रूप से रामायण की कथा यही समाप्त हुई थी ! अब इसके आगे कुछ और लिखने के लिए शेष नहीं बचा था !

युद्ध कांड के अंतिम सर्ग का 119वां श्लोक में यह भी लिखा है कि ‘रामायण मिदं कृत्स्नम श्रणवतः पठतः सदा ! ! प्रीयते सततम रामः स हि विष्णुः सनातनः’ यानी यही सम्पूर्ण रामायण का पाठ यही पूर्ण होता है ! आगे 121वें श्लोक में वाल्मीकि लिखते हैं, ‘एवमेतत पुराव्रत माख्यानम भद्रमस्तु वःप्रव्या हरत विस्त्रब्धम बलम विश्णोः प्रवर्धताम यानी यह इतिहास सम्पन्न हुआ !

अर्थात यहां वाल्मीकि राम कथा के पूर्ण होने की घोषिणा यहीं कर दी जाती है ! जब कथा पूर्ण हो गई तो फिर अचानक उत्तर रामायण कहाँ से और क्यों लिखा गया यह शोध का विषय है ! साफ जाहिर कि उत्तर कांड बाद में लिखा गया पर क्यों ?

युद्ध कांड में वाल्मीकि राम को ‘भ्रात्रभिः सहितः श्रीमान’ कहकर सम्बोधित करते हैं, यानी श्रीदेवी सीता हमेशा राम के साथ रहीं, तभी वह श्रीमान कहलाये ! युद्ध कांड के 128वें सर्ग में वाल्मीकि साफ-साफ लिखते हैं कि भगवान राम ने सीता जी के साथ तक अयोध्या पर राज्य किये !

लेकिन यहाँ पर दो बातों का वर्णन नहीं मिलता है ! पहली बात यह की राम जब सीता लक्ष्मण सहित अयोध्या वापस आये तो उनका अयोध्या की जनता ने पूर्ण उत्साह पूर्वक स्वागत किया और उनका राज्य अभिषेक कर उन्हें अयोध्या का राजा घोषित कर दिया !

किन्तु जब अयोध्या के आम आवाम को यह पता चला कि राम ने इंद्र के बहकावे में आकर अति तेजस्वी और तपस्वी ब्राह्मण पुत्र रावण की कुल वंश सहित हत्या कर दी है ! तब सबसे पहले महर्षि वशिष्ठ ने अयोध्या के राजगुरु पद का परित्याग कर दिया और वह अयोध्या छोड़ कर मनाली के गहन जंगलों में चले गये !

जिससे अयोध्या की जनता में भी भयानक आक्रोश व्याप्त हो गया ! इस आक्रोश को शांत करने के लिए भगवान राम ने विश्वामित्र और अगस्त ऋषि के परामर्श पर नैमिषारण्य के निकट  हत्या हरणी नामक स्थान पर 1 वर्ष तक सीता और लक्ष्मण के साथ रहकर अपने इस कृत्य का प्राश्चित किया था ! जो स्थान आज भी मौजूद है !

दूसरी बात वशिष्ठ ऋषि के चले जाने के बाद अयोध्या ब्राम्हण विहीन हो गई क्योंकि सभी ब्राह्मणों ने ब्राह्मण हत्यारे राम के विरोध में अयोध्या का परित्याग कर दिया ! तब विश्वामित्र के गुरुकुल कन्नौज से निम्न श्रेणी के ब्राह्मणों को जमीन का लालच देकर राम ने अपने राज्य में सरजू नदी के उस पार लाकर बसाया ! यहीं से ब्राह्मणों में सरजू पारी ब्राह्मण की शाखा प्रारंभ हुई !

जिसके बाद सरजू पारी ब्राह्मणों को ब्राहमण समाज से निकल दिया गया ! आज भी इनका आदर्श ग्रन्थ रामायण है अन्य धर्म ग्रंथों पर इनका कोई अधिकार नहीं है ! इसी वजह से इनके रीत-रिवाज, विचारधारा, दर्शन आदि कान्यकुब्ज ब्राह्मणों से मेल नहीं खाते हैं ! इसीलिए कान्यकुब्ज ब्राह्मण सरजू पारी ब्राह्मण के यहां अपने रोटी और बेटी का संबंध नहीं रखते हैं !

लक्ष्मण के अस्वस्थ्य रहने और जनता में व्याप्त भयंकर असंतोष के कारण राम कुछ ही समय में मानसिक अवसाद से ग्रसित रहने लगे ! तब उन्हें अपनी मानसिक चिकित्सा के लिये ऋषिकेश भेजा गया पर कोई स्थाई लाभ नहीं हुआ !

दूसरी तरफ माता सीता भी राम के बढ़ते हुये मानसिक रोग से व्यथित थीं ! इसी बीच वह गर्भवती हो गयी और अयोध्या के धोबी ने राम के प्रति आक्रोश में माता सीता के चरित्र पर आरोप लगा दिया ! जो एक शैव वंश परम्परा के राजा जनक की पुत्री राजकुमारी के लिये स्वाभिमान का विषय था !

अतः सीता ने अब राम के साथ अयोध्या में रहना उचित नहीं समझा और अपने प्रसव का बहाना करके राजा जनक की मृत्यु हो जाने के कारण वह तमस नदी के किनारे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में आ गई ! वहीं पर उन्होंने 2 जुड़वा बच्चों को जन्म दिया और मृत्यु तक वही महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रही ! जहां उनका खर्च व देखभाल उनके देवर भरत जी किया करते थे !

 इस तरह राम के मानसिक रूप से बीमार पड़ जाने के कारण उनका राजनीतिक प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा ! अवध साम्राज्य कई टुकड़ो में बंट गया और राम की लोकप्रियता दिन-ब-दिन घटने लगी !

 तब माता सीता और उनके दो पुत्र लव और कुश को उनका अधिकार दिलाने के लिए महर्षि वाल्मीकि का करुणामय ह्रदय पुन: लिखनी उठाने के लिए मजबूर हो गया ! उन्होंने लव और कुश को संगीत का प्रशिक्षण देकर अश्वमेध यज्ञ के समय राम के दरबार में भेजा और भरे समाज में उन्हें उनका अधिकार दिलवाया !

 इसके उपरांत राम के राजनीतिक प्रभाव के कमजोर पड़ने पर उन्होंने पुन: लेखनी उठाकर रामायण में उत्तरकांड का निर्माण किया ! उत्तरकांड में उन सभी घटनाओं का वर्णन मिलता है ! जहां पर राम कमजोर व्यक्तित्व के साथ दूसरे के प्रभाव में निर्णय लेते नज़र आते हैं !

इस तरह बाल्मीकि रामायण का उत्तरकांड रामायण पूर्ण हो जाने के उपरांत 12 वर्ष बाद लिखा गया अध्याय है ! जिसमें अति संवेदनशील कोमल हृदय के तपस्वी लेखक द्वारा राम के प्रति आक्रोश व्यक्त किया गया है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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