महाभारत की अज्ञानत महत्वपूर्ण नदी हिरण्यवती : Yogesh Mishra

हिरण्यवती नदी का प्राचीन संस्कृत नाम उज्जयिनी है ! इसे गण्डकी, इरावती, ‘बुद्धचरित’ के वर्णन के अनुसार यह नदी राप्ती की सहयोगी नदी जान पड़ती है !

किन्तु हिरण्यवती वामनपुराण के वर्णन के अनुसार सरस्वती नदी के समान ही पुण्य प्रदान करने वाली तथा वैतरणी नदी है !

हिरण्यवती नदी का उल्लेख वामनपुराण में महत्वपूर्ण नदी के रूप में वर्णन मिलता है ! यह कुरूक्षेत्र के पश्चिम में बहने वाली पवित्र नदी है ! जो स्वच्छ और विशुद्ध जल से भरी रहती है !

इस नदी में कंकर और कीचड़ नहीं होता है ! वैदिक काल में हिरण्यवती नदी भारत की प्रमुख नदियों में से एक है ! (उद्योग पर्व महाभारत 152.7-8) सरस्वती की सहायक नदियों में दृष्टावती तथा हिरण्यवती भी मानी गयीं थीं !

 इस नदी के जल के प्रभाव की आध्यात्मिक शुद्धता को देखते हुए पांडव लोगों ने कुरुक्षेत्र के पश्चिम की ओर इसी नदी के तट पर अपना सैन्य शिविर लगाया था ! इस सैन्य शिविर में भोजन की व्यवस्था का दायित्व धृतराष्ट्र पुत्र युयुत्सु को दिया था ! जो कि वास्तव में कौरव पुत्र थे !

 इसी नदी के जल की ही महिमा थी कि एक भी पांडव सैनिक में इस नदी के जल से बने हुए भोजन को ग्रहण करने के उपरांत पूरे महाभारत में न तो कभी पलायन किया और न ही पांडव के साथ कोई विश्वासघात का किया था ! कहने का तात्पर्य है कि महाभारत युद्ध में पांडवों सैनिकों की विश्वसनीयता का मूल आधार इसी नदी का जल था !

वरना कौरव की सेना से 24,165 सैनिक महाभारत युद्ध को छोड़कर या तो भाग गए थे या फिर पांडव के साथ मिलकर उन्होंने कौरव के साथ विश्वासघात किया था ! जिस कारण कौरव की युद्ध नीतियों की जानकारी पांडवों को पहले ही हो जाती थी ! जिस के अनुरूप पांडव अपने बचाव के लिए उचित नीति निर्धारण कर लेते थे !

महाभारत युद्ध के बाद आये भूकम्प में सरस्वती नदी के साथ दो अन्य महत्वपूर्ण नदियां दृष्टावदी और हिरण्यवती भी लुप्त हो गयी जो सरस्वती की सहायक नदियां थी !  लगभग 1900 ईसा पूर्व तक भूगर्भी बदलाव की वजह से यमुना, सतलुज ने अपना रास्ता बदल दिया ! जिससे हिरण्यवती तथा दृष्टावदी नदी भी 2600 ईसा पूर्व सूख जाने के कारण सरस्वती नदी लुप्त हो गई ! यही से सरस्वती नदी लुप्त होने के कारण कलयुग का प्रवेश माना जाता है !

बुद्ध लेखों के अनुसार लगभग 2500 वर्ष पूर्व बुद्ध ने हिरण्यवती नदी का जल पीकर भिक्षुओं को अंतिम उपदेश देने के बाद महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था ! यह अलग हिरण्यवती नदी है ! बुद्ध का दाह संस्कार मल्ल राजवंश ने चक्रवर्ती सम्राट की भांति इसी नदी के तट पर रामाभार में किया था ! उस समय नदी विशाल थी, यही कारण था कि बौद्ध भिक्षु महाकश्यप जब बिहार से यहां पहुंचे तो शाम होने के कारण नदी पार नहीं कर सके और प्रात: काल नदी पार करके रामाभार नगर वर्तमान कुशीनगर जिला गोरखपुर उत्तर प्रदेश पहुंच पाये थे ! तब जाकर बुद्ध का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ था ! इसीलिये हिरण्यवती का जल बौद्धों के लिए काफ़ी पवित्र है ! बौद्ध पर्यटक यहां से जल ले जाकर अपने पूजा घरों में रखते हैं !

प्राचीन मल्ल गणराज्य की राजधानी कुशीनगर के पूर्वी छोर पर प्रवाहित होने वाली हिरण्यवती नदी बुद्ध के महापरिनिर्वाण की साक्षी तो है ! यह मल्ल गणराज्य की समृद्धि और सम्पन्नता का आधार भी रही है ! प्राचीन काल में तराई के घने जंगलों के बीच बहती हुई यह नदी मल्ल राज्य की सीमा भी निर्धारित करती थी ! कहा जाता है कि इस नदी के बालू के कणों के साथ सोने के कण भी मिलते थे, जिसके कारण इसे हिरण्यवती कहा जाने लगा !

प्राचीन काल में जंगल में रहने वाले आदिवासी और जन जातियों के लोग इस नदी के बालू में से कठिन परिश्रम द्वारा सोने के कणों को अलग करके उनको उन समय के श्रेष्ठ जनों और साहुकारों को बेचते थे !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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मोबाईल : 9453092553

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