मात्र शैव तंत्र ही मानव का कल्याण कर सकता है : Yogesh Mishra

भगवान शिव ही शैव तंत्र विज्ञान के अविष्कारक हैं  क्योंकि आज विश्व में जो मानव संस्कृति दिखाई दे रही है इसके निर्माता, संरक्षक व निर्देशक भगवान शिव ही हैं ! सतयुग में समस्त सृष्टि पर भगवान शिव का ही एकाधिकार था ! कालांतर में सतयुग के उत्तरार्ध में ब्रह्म संस्कृति सरस्वती नदी के तट पर विकसित हुई ! जिन्होंने कृषि आधारित जीवन पध्यति के विकास के लिये वेदों का निर्माण किया और त्रेता के आरंभ में ब्रह्म संस्कृति के कमजोर पड़ने पर वैष्णव लोगों ने ब्रह्म संस्कृति पर कब्ज़ा कर लिया और पूर्ण विकसित वेद विज्ञान को गुरुकुल के पाठ्यक्रम में शामिल कर ! अपनी गुरुकुल आधारित शिक्षा पध्यति के माध्यम से पूरे विश्व को शिक्षित करने का ठेका लेकर पूरी दुनियां में गुरुकुल खोलने लगे ! जो गुरुकुल वास्तव में वैष्णव जासूसी के केन्द्र थे ! कालांतर में वैष्णव शासकों अपने शासन केन्द्र के रूप में जो सबसे पहले सभ्यता विकसित की वह मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यता थी ! जो कृषि प्रधान थी !

बाद में इसी वैष्णव संस्कृति ने अपने कृषि भूमि के विस्तार के लिए पूरी दुनिया में गुरुकुल आधारित शिक्षा पध्यति के माध्यम से शैव संस्कृति अर्थात प्रकृति आधारित सनातन संस्कृति को मानने वालों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया  और शैव संस्कृति के रक्षकों को असुर या राक्षस कह कर संबोधित करने लगे !

हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यप, राजा बलि और रावण आदि जैसे महान योद्धा आज जो खलनायक के रूप में इतिहास में जाने जाते हैं ! वह सभी वास्तव में शैव संस्कृति के रक्षक थे ! जो वैष्णव लुटेरों के लिये चुनौती बनकर अपने प्रजा की रक्षा के लिए खड़े थे जैसे आज अपनी संस्कृति और जमीन की रक्षा के लिए खड़े होने वाले नागरिकों को नक्सलवादी घोषित कर दिया गया है ! ठीक उसी तरह वैष्णव धर्म ग्रंथों में शैव संस्कृति के रक्षकों को राक्षस या असुर घोषित किया गया था ! जिसका बखान आज भी वैष्णव कथा वाचक बड़े बड़े मंचों से करते चले आ रहे हैं और हम अपने पूर्वजों के विरुद्ध षडयंत्रकारियों के यश गान पर ताली बजाते हैं और उन कथावाचकों को दान देते हैं ! जिनके आदर्शों ने हमारी मौलिक शैव संस्कृति को छल से नष्ट किया था !

जब शैव वैष्णव संघर्ष अपनी पराकाष्ठा पर था ! तब शैवों की रक्षा के लिए भगवान शिव ने स्वयं शैवों के आचार्य शुक्राचार्य को मृत संजीवनी विद्या के तंत्र का प्रशिक्षण दिया था ! जिसके द्वारा युद्ध में किसी भी पद्धति से मरे हुए व्यक्ति की क्लोनिंग करके उसे पुनः स्वास्थ और जीवित किया जा सकता था ! जिससे वैष्णव निरंतर युद्ध में हारने लगे ! तब विष्णु के निर्देश पर देवताओं के गुरु बृहस्पति ने अपने पुत्र कच को शुक्राचार्य के पास भेजा और उसने सेवा, श्रद्धा और गुरु-भक्ति का आडम्बर करके शुक्राचार्य को प्रसन्न कर मृत संजीवनी विद्या हासिल करके शुक्राचार्य की रूपवान बेटी देवयानी को धोखा देकर वहां से भाग आया और छल द्वारा आचार्य शुक्राचार्य से प्राप्त इस मृत संजीवनी विद्या का वैष्णव सैनिकों को भी पुनः जीवित करने में प्रयोग करने लगा ! जिससे वैष्णव पुन: सशक्त होने लगे और शैवों पर अत्याचार करने लगे ! (इस सन्दर्भ में विस्तृत लेख अलग से लिखूँगा)

 कालांतर में त्रेता युग में परशुराम के शिष्य महान प्रतापी रावण ने भी भगवान शिव को अपनी तपस्या से प्रसन्न करके उनसे शैव तंत्र के विधान को सिखा था और इसी शैव तंत्र के प्रभाव से रावण में समस्त ग्रहों की नकारात्मक शक्तियों को नियंत्रित कर लेने का समर्थ पैदा हुआ था ! यहां तक कि उसने काल को भी अपने नियंत्रण में कर लिया था और पूरी पृथ्वी पर अपना शासन स्थापित कर लिया था ! तब ब्रह्मा जी के आग्रह पर वैष्णव लोगों को पृथ्वी के कर्क रेखा के ऊपर के क्षेत्र में निवास करने का अधिकार दिया था ! जिस अवसर का लाभ उठाकर देवताओं के राजा इंद्र ने रावण को खत्म करने की एक योजना बनाई और राम के माध्यम से रावण की हत्या करवा दी ! जिसका बाद में राम ने प्राश्चित भी किया था !

 कहने का तात्पर्य यह है कि शैव तंत्र ही एक मात्र ऐसा विज्ञान है ! जो समस्त मानवता की रक्षा कर सकता है और इसके द्वारा ही पृथ्वी पर होने वाले सभी षडयंत्र (जैविक हमले) नियंत्रित किये जा सकते हैं ! बस आवश्यकता है इस शैव तंत्र के कालजायी विज्ञान को जानने की जो मंत्र, यंत्र, जंत्र और तंत्र के साथ-साथ आयुर्वेद और ज्योतिष पर आधारित है ! यह एक मात्र शैव तंत्र विज्ञान ही है जो मानवता का कल्याण कर सकता है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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मोबाईल : 9453092553

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