भारतीय संस्कृति में पत्नी को ‘सहधर्मिणी’ और ‘अर्धांगिनी’ की उपाधि दी गई है, जिसका वास्तविक अर्थ है,धर्म, कर्म और जीवन के हर संकल्प में पति के साथ समान रूप से कदम मिलाकर चलना।
आधुनिक युग में, जहाँ मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं और शहरी चकाचौंध के पीछे भाग रहा है, वहाँ त्याग और निस्वार्थ प्रेम के उदाहरण अत्यंत दुर्लभ हो गए हैं।
ऐसे समय में, मैं सनातन ज्ञान पीठ का संस्थापक श्री योगेश कुमार मिश्रा की धर्मपत्नी का यह निर्णय कि वह शहरों के सुख को त्याग कर पति के साथ ग्राम निवास करेंगी, यह न केवल वंदनीय है, बल्कि संपूर्ण समाज के लिए एक महान प्रेरणा भी है।
उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि अत्यंत प्रतिष्ठित और वैभवशाली रही है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) के न्यायामूर्ति की बहू होना, मैं स्वयं सर्वोच्च न्यायालय के सरकारी अधिवक्ता और उत्तर प्रदेश के गौ एवं जीव जंतु रक्षा विभाग के प्रतिष्ठित पदाधिकारी रहा हूँ वह मेरी पत्नी हैं !
यह स्पष्ट करता है कि उनका संपूर्ण जीवन किस स्तर की सुख-सुविधाओं और विलासिता में व्यतीत हुआ है। उन्हें समाज का हर वह मान-सम्मान और भौतिक सुख प्राप्त है, जिसकी एक सामान्य मनुष्य केवल कल्पना कर सकता है। वातानुकूलित कमरों, आधुनिक संसाधनों और महानगरों की सुगमता, नौकर चाकर के बीच उनका जीवन एक रानी के समान बीता है ।
परंतु, सच्ची महानता सुख भोगने में नहीं, बल्कि किसी बड़े उद्देश्य के लिए उसे त्यागने में होती है। जब मैंने आने वाली पीढ़ियों के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए यह कठोर संकल्प लिया कि मैं शहर का आरामदायक जीवन त्यागकर एक अत्यंत अविकसित और अभावग्रस्त गाँव में ‘शैव ग्राम’ नामक आश्रम की स्थापना करूँगा, तब मेरी पत्नी इस कार्य में सहयोग करने के लिये सहर्ष तैय्यार हो गयी ! यह महलों से निकलकर झोपड़ी और धूल-मिट्टी के बीच जाने जैसा है।
ऐसे कठिन मोड़ पर, उन्होंने एक आदर्श भारतीय नारी के सर्वोच्च गुणों का परिचय दिया। उन्होंने पति के इस वैराग्यपूर्ण और समाजोपयोगी निर्णय को न केवल सहर्ष स्वीकार किया, बल्कि जीवन के अंतिम और विश्राम के दौर में उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलने का निश्चय किया।
शहर की जिन सुख-सुविधाओं की उन्हें जीवन भर आदत रही थी, उन्हें उन्होंने एक क्षण में मुस्कुराते हुए त्याग दिया। यह निर्णय साधारण नहीं है; यह एक तपस्या है।
उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा सुख और शांति भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि जीवनसाथी के साथ एक पवित्र और महान उद्देश्य की पूर्ति में है। उनका यह कदम केवल पतिव्रत धर्म का पालन नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति के उस मूल मंत्र का जीवंत उदाहरण है जहाँ ‘त्याग’ को ‘भोग’ से ऊपर रखा गया है।
धन्य है ऐसी पत्नी! उनके इस अप्रतिम त्याग ने न केवल ‘शैव ग्राम’ की नींव को अपनी पवित्रता से सींचा है, बल्कि आधुनिक समाज की उस मानसिकता को भी आईना दिखाया है जो केवल धन और सुख के पीछे भागती है।
उनका यह आचरण आने वाली पीढ़ियों को सदैव यह सिखाता रहेगा कि जब संकल्प बड़ा हो, तो बड़े से बड़ा सुख भी छोटा हो जाता है। उनका जीवन इतिहास के पन्नों में समर्पण और सादगी के एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज किया जायेगा।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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