रामायण में उत्तर कांड अलग से लिखा गया क्यों मालूम पड़ता है : Yogesh Mishra

प्रथम अध्याय के आरम्भ में ही 1/4/1 पर यह स्पष्ट लिखा है कि “भगवान् राम के राज्याभिषेक के बाद वाल्मीकि ने इन विवरणों को एक साथ 24,000 श्लोकों तथा 500 सर्गों में विभाजित कर छः कांडों में लिखा !” दूसरी महत्वपूर्ण बात जिसका उल्लेख 1/3/39 में है कि “वाल्मीकि ने उत्तर काण्ड की रचना बाद में अलग से की थी ! जिसमें उन्होंने राम के राज्याभिषेक के बाद होने वाली घटनाओं का उल्लेख किया था !”

यह दो ही प्रमाण अपने आप में वर्णनात्मक हैं और केवल एक बात कहते हैं कि रामायण के प्रथम छः अध्यायों में जो कुछ भी कहा गया है वह इसकी रचना से पूर्व घटित हो चूका था ! इससे यह भी निष्कर्ष भी निकलता है कि भगवान् राम तथा वाल्मीकि दोनों ही रामायण लिखने के समय जीवित व्यक्ति थे !

वस्तुतः महर्षि वाल्मीकि ने छः अध्याय समाप्त करने के काफी समय बाद सातवाँ अध्याय लिखने का निश्चय किया था ! इस तथ्य का पता केवल एक बार रामायण पढने से हो जाता है ! रामायण में सभी छः अध्याय तथा सातवें अध्याय के बीच स्पष्ट अंतराल (असंगति) है !

युद्ध काण्ड (छठां अध्याय) श्रीराम के अयोध्या में राजतिलक से समाप्त होता है और इस ही रूप में रामायण निश्चय ही पूर्ण हो गया ! सातवें अध्याय के (उत्तर काण्ड) आरम्भ में नई शुरुआत की गई है ! यह यह असंगति हमें पहले से दुसरे, दुसरे से तीसरे, तीसरे से आगे तथा अंत तक छठें अध्याय में जाने पर भी नहीं मिलती !

किन्तु सातवां अध्याय उत्तर कांड रामायण अध्ययन में अलग से लिखा गया मालूम पड़ता है क्यों ?

जब ब्रह्म हत्या के दोषी राम ने महातपस्वी शिव भक्त रावण के कुल वंश सहित हत्या का प्राश्चित हत्याहरणी नामक स्थल पर जो कि अब सीतापुर जिले में आता है एक वर्ष तक रह कर किया था ! इसके बाद भी भारत के आम आवाम ने राम को माफ़ नहीं किया !

उनके राजगुरु वशिष्ठ अयोध्या त्याग कर मानली चले गये थे ! विश्वामित्र के निर्देशन में उनके ही गुरुकुल के ब्राह्मणों ने राम के यहाँ अश्व मेघ यज्ञ करवाने से इंकार कर दिया था ! राज माता सीता के चरित्र पर एक धोबी जैसा सामान्य व्यक्ति भी प्रश्न खड़े करने लगा !

अयोध्या में बढ़ते जन आक्रोश से राम का जीना हराम हो गया था ! उनकी लोक प्रियता निरंतर घट रही थी ! जिस वजह से वह अनिन्द्रा के रोगी हो गये थे ! राम रावण महायुद्ध के बाद धर्मानुसार सामाजिक मर्यादा में सूर्यवंशी क्षत्रिय होकर अब वह संन्यास भी नहीं ले सकते थे ! परिणामत: उन्हें सामाजिक दबाव में गर्भवती सीता का परित्याग करना पड़ा !

यह बात महर्षि बाल्मीकि को पसंद नहीं आयी ! उन्होंने जिस राम को विष्णु का अवतार मान कर सर्वशक्तिमान मानते हुये जिस प्रभावशाली व्यक्तित्व का लेखन रामायण जैसे अनादि ग्रन्थ में किया था, वह अन्दर से इतना कमजोर और खोखला होगा इसका उन्हें अंदाजा नहीं था !

महर्षि बाल्मीकि माता सीता को अपने आश्रम ले आये और वहीँ पर सीता का प्रसव हुआ जिससे दो संतान लव और कुश प्राप्त हुये ! जिन्हें राम सामाजिक मर्यादा के भय वश स्वीकार करने को तैय्यार नहीं थे ! तब महर्षि बाल्मीकि का ब्राह्मणत्व जाग उठा और उन्होंने राम के विरुद्ध दुबारा लेखनी उठा ली ! तब रामायण में उत्तर कांड का निर्माण किया !

जिसमें सीता के त्याग से लेकर राम द्वारा लोक चाटुकारिता में शम्बूक की हत्या तक का सब कुछ लिख डाला ! राम के मानसिक रोग से व्यथित होकर अपमानित लक्ष्मण की जल समाधि, माता सीता द्वारा बाल्मीकि आश्रम के कुयें में कूद कर आत्म हत्या, जिससे व्यथित राम का अवसादग्रस्त अवस्था में अयोध्या से ऋषिकेश पलायन कर जाना आदि सभी कुछ लिख डाला !

और अन्तः मानसिक रोग से व्यथित राम के भी सरजू में कूद कर आत्मा हत्या की घटना का वर्णन भी इसी उत्तर कांड में मिलता है ! किन्तु इस सब लेखन से वैष्णव कथा वाचकों को अपनी दुकान चलाने में समस्या पैदा होने लगी इसीलिये वह चीख चीख कर चिल्लाने लगे कि रामायण का उत्तर कांड मुगलों द्वारा जुड़वाया गया था ! जोकि नितांत गलत है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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