राम रावण युद्ध का अज्ञात इतिहास : Yogesh Mishra

सभी वैष्णव इतिहासकारों ने राम को मर्यादा पुरुषोत्तम और रावण को खलनायक बतलाया ! जबकि यह मात्र उस युद्ध का परिणाम था, जो इंद्र के अहंकार के कारण हुआ था !

उस समय पृथ्वी पर अनेक संस्कृतियों अपने-अपने तरीके से पनप रही थी ! देव, दानव, दैत्य, असुर, यक्ष, किन्नर आदि आदि ! इसी समय रावण ने एक नयी “रक्ष” संस्कृति की स्थापना की थी ! जो शैव उपासना पद्ध्यती की पोषक थी ! सभी संस्कृतियों की अलग-अलग जीवनशैली थी, अलग-अलग भाषा थी और अलग-अलग वास्तु था ! जिन पर वैष्णव अपना नियंत्रण करना चाहते थे !

क्योंकि देवताओं के विलासी राजा इंद्र लंबे समय से विष्णु के उकसाने से वैष्णव संस्कृति की स्थापना हेतु दैत्य, दानव, असुर आदि शैव उपासकों के साथ निरंतर युद्ध कर रहे थे ! जिसमें से अनेक युद्धों में वह निरंतर हार भी रहे थे ! अत: अब इंद्र का मनोबल टूटने लगा ! तब देवताओं ने दैत्य, दानव, असुर आदि से संधि करने की सोची !

अत: उन्होंने यह निर्णय लिया कि दानव राज “मय” जो कि शैव वास्तु के विशेषज्ञ थे ! उनकी मदद से एक शैव संस्कृति के अनुरूप भवन बनवाया जाये और उसमें शिव भक्त दैत्य, दानव, असुर आदि को आमंत्रित कर मित्रता का संदेश दिया जाये !

जिस हेतु उन्होंने दानव राज मय को पत्नी सहित भोजन पर आमंत्रित किया और अपनी मंशा बतलायी ! किन्तु दानव राज मय देवताओं के लिये इस तरह भवन को बनाने को तैयार न थे ! अत: दानव राज मय पर दबाव बनाने के लिये इंद्र ने उनकी पत्नी हेमा को गिरफतार कर लिया ! जो कि रक्ष राज रावण की पत्नी मंदोदरी की माँ थी !

इसी दौरान रावण विश्व विजय यात्रा पर निकला और जब विश्व विजय के उपरांत रावण वापस लंका आया तब विश्व विजेता रावण के आगमन पर लंका में एक बड़ा उत्सव हुआ किंतु इस उत्सव में मंदोदरी खुश न थी ! जिसका कारण पूछने पर मंदोदरी ने रावण को बतलाया कि उसकी मां हेमा इस समय इंद्र के कैद में है !

रावण को इस तथ्य की जानकारी लगते ही उसने तत्काल अपने बड़े पुत्र मेघनाथ को बुलाकर इंद्र के कैद से अपनी नानी को छुड़ा कर लाने का आदेश दिया ! मेघनाथ तत्काल सेना लेकर इन्द्रलोक अर्थात स्वर्ग गया और युद्ध में इन्द्र को हरा कर अपनी नानी हेमा को आजाद करावा लिया और इन्द्र को भी गिरफतार कर लंका ले आया ! और इस घटना के बाद रावण द्वारा मेघनाथ को इन्द्रजीत की उपाधि दी गयी !

 मेघनाथ ने जब इस युद्ध में इन्द्र को हरा कर गिरफतार कर रावण के दरबार में पेश किया ! तो रावण ने लज्जित इंद्र के माफी मांगने पर उसे इस शर्त के साथ रिहा किया कि वह अब कभी कर्क रेखा के नीचे विचरण नहीं करेगा और कभी भी स्त्रियों के साथ शाररिक सुख के लिये उन्हें छलेगा नहीं ! 

और रावण ने अपनी उदारता दिखाते हुये देवताओं के राजा इंद्र क्षमा कर दिया ! इन्द्र जब वापस देवलोक आये और विष्णु के नेतृत्व में देवताओं की बड़ी सभा हुई ! जिसमें यह निष्कर्ष निकला कि जब तक शिव भक्त रावण को कुल खानदान सहित नष्ट नहीं किया जायेगा, तब तक इस पृथ्वी पर वैष्णव संस्कृत की स्थापना करना असंभव है !

और बस यहीं से शुरू हुआ रावण के हत्या का षड्यंत्र ! इस षड्यंत्र को क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी वैष्णव क्षत्रिय महर्षि विश्वामित्र को दी गई !  महर्षि विश्वामित्र ने देवताओं को यह अवगत करवाया कि रावण के परम मित्र दशरथ को रावण ने यह वचन दिया है कि वह कभी भी अपनी तरफ से दशरथ या उनके पुत्रों के विरुद्ध किसी भी युद्ध में पहले हथियार नहीं उठायेगा !

और रावण द्वारा दशरथ को दिया गया यह वचन ही इस षड्यंत्र में “राम” के चयन का मूल कारण बना ! इसका लाभ उठाकर विश्वामित्र ने सर्वप्रथम दशरथ से उनके पुत्र राम को मांग कर रावण के की नानी ताड़का और उसके ममेरे भाई सुबाहु की हत्या करवा दिया !

इसके बाद उस समय के परम योगी तेजस्वी शिव भक्त राजा जनक के पास जो शिव का दिव्य अस्त्र “पिनाक” था, उसे राम के हाथों तुड़वा दिया और शिवभक्त राजा जनक की बेटी का विवाह वैष्णव शासक दशरथ के पुत्र राम से करवा दिया ! यहीं से रावण हत्या का षड्यंत्र फलीभूत होना शुरू हो गया !

फिर विश्वामित्र द्वारा मंथरा के माध्यम से कैकई को भड़का कर राम को 14 वर्ष के लिये वनवास भेजा गया ! राम पिता के आदेश पर वनवास चले गये और कर्क रेखा के ऊपर वैष्णव उपासना क्षेत्र चित्रकूट में रहने लगे !

वहां से निरंतर राम के ऊपर यह दबाव डाला गया कि वह चित्रकूट छोड़कर कर्क रेखा के नीचे रावण के क्षेत्र में जाकर प्रवास करें ! जिसके लिये सीता कभी तैयार नहीं थी ! किन्तु इन्द्र विष्णु और विश्वामित्र के दबाव में राम को चित्रकूट छोड़ कर महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के किनारे पंचवटी जाना पड़ा ! जब इस सब षड्यंत्र की जानकारी रावण को हुई तो उसने 12 वर्ष तक बिना किसी अवरोध के राम को अपने क्षेत्र में पंचवटी आश्रम में रहने दिया !

 जब 12 वर्ष तक युद्ध की शुरुआत नहीं हुआ और दोनों ही पक्ष राम व रावण एक दूसरे के कार्य में अवरोध नहीं बल्कि सहयोग कर रहे थे ! तब इंद्र, ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं को युद्ध शुरू न होने के कारण चिंता होने लगी !

 अत: उन्होंने अपने षड्यंत्र में शामिल वैष्णव उपासक विभीषण के माध्यम से रावण की छोटी बहन सुपनखा को यह अवगत करवाया कि उसकी नानी तड़का और मामा सुबाह को मारने वाले राजा दशरथ के पुत्र राजकुमार इस समय रावण के राज्य में ही पंचवटी में रह रहे हैं !

जिस विभीषण के षड्यंत्र को सूपनखा समझ नहीं पायी और वह रावण की आज्ञा के बिना ही राम को नानी तड़का और मामा सुबाह की हत्या का उलेहना देने के लिये पंचवटी पहुंच गयी ! जहां पर लक्ष्मण से उसका विवाद हो गया और लक्ष्मण में उसके नाक कान काट लिये ! जिससे आहत सूपनखा अपने भाई खर-दूषण के पास गई और दूसरी तरफ राम के नाना सुकौशल जोकि दक्षिण कौशल वर्तमान छतीसगढ़ के राजा थे ! उन्होंने राम की सुरक्षा के लिये तत्काल सेना भेज दी ! जिसका खर दूषण के साथ युद्ध हुआ और उसमें खर दूषण हार गये और उनकी हत्या हो गई !

तब सूपनखा अपने भाई रावण के पास गयी क्योंकि रावण ने दशरथ को यह वचन दिया था कि वह कभी भी दशरथ या उनके पुत्रों के विरुद्ध प्रथम हथियार नहीं उठायेगा ! अतः राजनैतिक कूटनीति के तहत राम को क्षमा मंगवाने के लिये रावण ने राम की पत्नी सीता के अपहरण कर लिया ! आगे की कथा आप सभी जानते ही हैं !

जिस षड्यंत्र में विश्वामित्र के साथ “रक्ष संस्कृति विरोधी” रावण के फूफा महर्षि अगस्त, नाना महर्षि भारद्वाज, भाई कुबेर, वैष्णव उपासक विभीषण, उसकी बेटी त्रिजटा, उसके दामाद हनुमान, रावण के ताऊ जामवंत, साला सुग्रीव, साले का पुत्र अंगद, इन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा तथा पूरे विश्व से 300 से अधिक वैष्णव उपासक क्षत्रिय शासक शामिल थे ! रावण ने जिनको विश्व विजय अभियान से अनुशासित कर रखा था !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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मोबाईल : 9453092553

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