राम रावण युद्ध में हमने क्या खोया : Yogesh Mishra

बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि आज से 7500 साल पहले जब विश्व की आबादी मात्र डेढ़ करोड़ थी !

तब उसमें भी अधिकांश लोग अपनी सुविधाओं के लिए रावण के साम्राज्य “रक्ष प्रदेश” में निवास करते थे !

 रावण का साम्राज्य कर्क रेखा के नीचे संपूर्ण एशिया, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका से होते हुये दक्षिण अमेरिका फैला हुआ था ! जो उस समय बालीद्वीप (बाली), मलायाद्वीप (मलेशिया), अंगद्वीप, शंखद्वीप, खुशद्वीप आदि अनेकों नाम से जाना जाता था !

 रावण के साम्राज्य का सबसे बड़ा घनी आबादी वाला क्षेत्र “कुमारी कंदम” था ! जो वर्तमान श्रीलंका से नीचे दक्षिण दिशा में त्रिभुजाकार आकृति में भूखंड था !

जिसका एक उत्तरी सिरा श्रीलंका को स्पर्श करता था तो दूसरा सिरा वर्तमान ऑस्ट्रेलिया को स्पर्श करता था और तीसरा सिरा अफ्रीका को स्पर्श करता था !

 यह उस समय का विश्व का सबसे अधिक विकसित और सुविधा संपन्न राज्य था ! यहीं पर रावण के सभी अत्याधुनिक कल कारखाने और अंतरिक्ष यान,  सैटेलाइट,  एवं मानव जीवन के लिए उपयोगी अति आधुनिक वाहन, यान, रडार आदि के निर्माण करने वाले कारखाने मौजूद थे ! जिनका संचालन उसका छोटा भाई कुंभकरण किया करता था !

 रावण के अस्त्र शस्त्र का निर्माण कार्य ऑस्ट्रेलिया में हुआ करता था ! जिससे इस युद्ध के दौरान वैष्णव लोगों ने पूरी तरह से तबाह कर दिया था ! जिसके रेडिएशन के कारण आज भी ऑस्ट्रेलिया में निरंतर वर्षा होने के बाद भी वहां की भूमि बंजर ही है ! ऑस्ट्रेलिया का पुराना नाम “अस्त्रालय” था !

कुमारी कंदम क्षेत्र को राम ने रावण के युद्ध के दौरान वैष्णव समर्थित ऋषि-मुनियों से प्राप्त दिव्य अस्त्र शस्त्र की मदद से दक्षिण ध्रुव की बर्फ को पिघला कर समुद्र में डुबो कर नष्ट कर दिया था ! जिसके अवशेष आज प्राप्त हो रहे हैं !

रावण के समय के विकसित किए हुए सेटेलाइट आज भी पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा रहे हैं ! जिनके संदेशों को डिकोड करने की कोशिश की जा रही है ! इस पर मैंने पूर्व में कई विस्तृत लेख लिखे हैं !

 उस समय के भौतिक विज्ञान के अलावा रावण ने मानसिक ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में भी बहुत कार्य किया था ! तंत्र, ज्योतिष, अध्यात्म, साधना, वेद, उपनिषद, संगीत, कर्मकांड आदि के क्षेत्र में भी रावण के प्रोत्साहन और आलौकिक ज्ञान से मनुष्य ने काफी लाभ हुआ था ! जो मानवता के विकास और विस्तार में सहायक था !

 अर्थात कहने का तात्पर्य है कि आज वैष्णव जिस हड़पी हुई संस्कृति को अपना बतलाकर सदियों से गुरुकुलों में पढ़ा रहे हैं, उसका अधिकांश हिस्सा रावण ने अपनी सूझबूझ और संसाधनों से विकसित किया था ! जो विकास का क्रम राम रावण युद्ध के दौरान नष्ट गया !

यदि यह विकास का क्रम निरंतर चलता रहता तो आज हमें इस ब्रह्मांड में किसी भी एलियन के विज्ञान से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं पड़ती ! हम इस ब्रह्मांड में सभी संस्कृतियों से अधिक विकसित और सभ्य होते ! हम अपनी रक्षा करने के लिए स्वयं सक्षम होते !

 इस तरह मेरी समझ में राम ने इंद्र के बहकावे में आकर रावण से युद्ध करके मानवता के विकास क्रम को बहुत बड़ी क्षति पहुंचाई है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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