रावण ने ब्रह्मा जी से अमृत ज्ञान का वरदान मांगा था और उस ज्ञान से निर्मित उस सिद्ध अमृत को उसने अपनी नाभि में रख लिया था ताकि उसकी मृत्यु न हो सके ! इसी सिद्ध अमृत साधना से उसके कटे हुए अंगो को फिर से उग जाते थे या किसी बीमारी या विकलांगता से खराब हुए अंग फिर से सही हो जाते थे तथा अपनी बूढ़ी, जर्जर और कमजोर हो चुकी शरीर को वह पुनः पुनः फिर से एकदम जवान कर लेता था ! इसके लिये मृत संजीवनी मृत्युंजय साधना एकदम शुद्धता पूर्वक पूरे विधि विधान से किया जाना आवश्यक है !
ब्रह्मा जी को यह विद्द्य भगवान शिव ने सिखायी थी ! बाद में भगवान शिव ने देवासुर संग्राम के समय यह ज्ञान असुरों के गुरु शुक्राचार्य को दिया था ! जिसे कालांतर में मृत संजीवनी विद्या कहा गया !
मृत संजीवनी विद्या, वही विद्या है जिससे देवासुर संग्राम में शुक्राचार्य ने मरे हुए दैत्यों को फिर से जीवित किया था ! इस साधना में कई यौगिक, मान्त्रिक और भौतिक प्रक्रियाएं शामिल होती है ! इस साधना के लिए 6 अति दिव्य औषधियों का मिश्रण लेना होता है और पारे के साथ विशेष बर्तन में विशेष रीति से उसे पकाना पड़ता है ! इन 6 औषधियों में सिर्फ एक ही औषधि सोमरस है ! जो आज सहज ही पृथ्वी पर हिमालय क्षेत्र में उपलब्ध है ! बाकी 5 औषधियाँ उच्च लोकों सांगला आदि घाटी में ही मिलती हैं !
इन औषधियों को पारे के साथ पकाने पर वह तरल एक अग्नि के समान दहकता हुआ, स्वर्ण आभा लिए हुए एक महा दिव्य पेय तैयार होता है ! इसी दिव्य तरल को शरीर में नाभी मार्ग से डाला जाता है और जो डालता है उसे भी कुछ घंटे तक अपनी सांस रोक कर प्राणायाम की कुम्भक की स्थिति में एकाग्र मन से बैठना पड़ता है ! जब तक की वह सम्पूर्ण तरल उस व्यक्ति के शरीर के सभी कोशिकाओं में प्रवेश न कर जाये !
इस क्रिया के पूर्ण होने पर अगले कुछ घंटे में व्यक्ति का शरीर फिर से नये स्वस्थ शरीर के रूप में निर्मित हो जाता है ! और वह अमृत धारण कर लेता है !
यही प्रक्रिया किसी मृत व्यक्ति के साथ उसे पुनः जीवित करने के लिये करनी पड़ती है ! इस प्रक्रिया के उपरांत बस कमी रह जाती है तो उस मृत व्यक्ति में प्राण डालने की ! जिसके बिना यह शरीर जीवित नहीं कहा जा सकता है !
अत: दूसरे चरण में उस नव निर्मित शरीर में प्राण डालने के लिये, उस व्यक्ति को जिसने पिछले कुछ घंटे से अपनी सांस रोक कर रखी थी ! उसे अपना सूक्ष्म शरीर प्राण के साथ, अपने स्थूल शरीर से बाहर निकाल कर उस नव निर्मित शरीर के अन्दर घुसाना पड़ता है ! जिसे परकाया प्रवेश की विशिष्ट स्थिति भी कहते हैं ! फिर अन्दर घुस कर वह मृत संजीवनी मन्त्र के साथ कुछ विशिष्ट मन्त्रों का पूरे विधान से मानसिक अनुष्ठान करता है और मरे हुए शरीर में प्राण का आवाहन करता है ! जिससे उस शरीर में फिर अभीष्ट आत्मा वापस प्रवेश कर जाती है !
इस क्रिया को करने के कुछ क्षणों में मरे हुये व्यक्ति के प्राण वापस उसके देह में आ जाते हैं और मरा हुआ आदमी पुनर्जीवित हो उठता है ! तब नव निर्मित शरीर के प्राण वापस आने पर आवाहन कर्ता को अपना सूक्ष्म शरीर और प्राण वापस अपने शरीर में लौटा लेना चाहिए ! इस तरह मृत संजीवनी की कठिन विद्या सफल होती है ! इस तरह से यह प्रक्रिया की जाती है !
मेरे गुरु जी ने इस क्रिया के द्वतीय अंश के द्वारा मेरी माँ को 1974 में पुनः जीवित किया था जो वर्ष 2017 तक जीवित रहीं ! यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है !!
आखिर संपन्न व्यक्तियों पर तंत्र का प्रभाव क्यों नहीं होता है : Yogesh Mishra
तंत्र सभी पर समान रूप से कार्य करता है ! किंतु प्रायः देखा जाता है कि मध्यम और निम्न वर्ग के लोग तंत्र के प्रभाव में जल्दी आ जाते हैं ! जबकि अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग का व्यक्ति तंत्र के प्रभाव में जल्दी नहीं आता है ! इसका मूल क्या कारण है !
इसके तीन प्रमुख कारण हैं :
नंबर 1 संपन्न वर्ग के व्यक्ति की ग्रह स्थिति इतनी प्रबल होती है कि उन ग्रह शक्तियों के प्रभाव से वह व्यक्ति संपन्नता की पराकाष्ठा पर निरंतर बना रहता है और जब किसी भी व्यक्ति की ग्रह स्थितियां बहुत मजबूत होती है तो उस स्थिति में उस व्यक्ति के ऊपर तंत्र का प्रयोग किया जाना आसान नहीं होता है !
अतः संपन्न व्यक्ति बहुत कम तंत्र के प्रभाव में आते हैं लेकिन ग्रहों के संधि काल की अवस्था में या कुंडली में अल्प मारण या नुकसान का योग चल रहा है तो उस समय यदि संपन्न व्यक्ति पर तंत्र का प्रयोग किया जाता है तो वह संपन्न व्यक्ति भी तंत्र के प्रभाव में आ जाता है !
दूसरा कारण प्रायः सभी संपन्न व्यक्ति किसी न किसी गुरु के अधीन उसके संरक्षण में रहते हैं या अपने भले के लिए निरंतर कोई न कोई पूजा अनुष्ठान आदि किसी योग्य गुरु से करवाते रहते हैं ! जिस वजह से उन्हें प्रकृति का विशेष संरक्षण प्राप्त होता है और उस संरक्षण के कारण सामान्य तंत्र या कोई सामान्य तांत्रिक उनके ऊपर तंत्र प्रयोग नहीं कर पाता है !
नंबर 3 प्राय: महत्वपूर्ण पदों पर बैठा हुआ व्यक्ति किसी न किसी तंत्र की उर्जा के प्रभाव से उस स्थान पर बैठाया जाता है ! जहां पर सामान्य भौतिक तथा विधिक शक्तियों का केंद्र होता है अर्थात दूसरे शब्दों में कहा जाये कि जैसे कोई सामान्य व्यक्ति प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनता है तो संवैधानिक शक्तियां उसके हाथ में आ जाती हैं और ऐसे संवैधानिक शक्तियों के प्रयोग करने वाले व्यक्ति के पीछे जो लोग उस व्यक्ति से अपने कार्य करवाते हैं ! वह अपने संसाधनों से उस व्यक्ति को तंत्र का संरक्षण प्रदान करते हैं !
उदाहरण के लिए सिकंदर जब विश्व विजय की यात्रा पर निकला था तब उसकी तांत्रिक मां ने उसे तंत्र से संरक्षण प्रदान किया था किंतु भारत पर आक्रमण करने के उपरांत यहां के तांत्रिकों ने उसके माँ के तंत्र के प्रभाव को नष्ट कर दिया था ! जिस वजह से सिकंदर की मृत्यु हो गई !
ऐसे ही इतिहास में और भी हजारों उदाहरण मिलेंगे कि सामान्य से सामान्य व्यक्ति बहुत तेजी से ऊपर उठता है और जब उसका सामना किसी योग्य तांत्रिक से होता है तो उसके प्रभाव में वह सहयोग करने वाला तंत्र नष्ट हो जाता है और व्यक्ति के अंदर सभी योग्यता क्षमता प्रतिभा होते हुए भी वह व्यक्ति स्वत: समाप्त हो जाता है !
अर्थात दूसरे शब्दों में कहा जाये कि संपन्न व्यक्ति भी तंत्र का लाभ उठाकर ही संपन्न होते हैं और जब तंत्र का सहयोग बंद हो जाता है तो संपन्न से संपन्न व्यक्ति भी नष्ट हो जाते हैं किंतु इन शक्तियों की जानकारी आम जनमानस को नहीं होती है इसलिए वह लोग यह मानते हैं कि संपन्न व्यक्ति के ऊपर तंत्र का प्रभाव नहीं होता है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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