शोध परक लेख
वर्तमान समय में यह एक बहुत ही सामान्य प्रश्न है कि जो संत वास्तव में सिद्ध, पहुंचे हुए और आत्मज्ञानी होते हैं, उनके आश्रमों में अक्सर बहुत कम लोग क्यों दिखाई देते हैं? वहीं, दूसरी ओर जहाँ चमत्कार, आडंबर और सांसारिक लाभ के वादे होते हैं, वहाँ लाखों की भीड़ उमड़ती है।
भारतीय दर्शन और रहस्यवाद में इस घटना को समझने के लिए हमें आध्यात्मिक, परा-आध्यात्मिक दृष्टि से गुरु और शिष्य के पूर्व जन्म के कार्मिक संबंधों को गहराई से समझना होगा।
अध्यात्म में वास्तविक गुरु और शिष्य का संबंध किसी विज्ञापन या मार्केटिंग से नहीं जुड़ा है, बल्कि यह जन्म-जन्मांतर के ‘ऋणानुबंध’ (कर्मों के लेन-देन) पर आधारित होता है।
इसीलिये चुनिंदा आत्मायें ही एक सच्चे गुरु तक पहुँच पाती हैं, सच्चा गुरु भी केवल उसी शिष्य को स्वीकार करता है जिसके साथ उसका पिछले जन्मों का आध्यात्मिक अनुबंधन हो। जब कोई शिष्य कई जन्मों की साधना के बाद उस अवस्था में पहुँचता है, जहाँ उसे अंतिम मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, तब ब्रह्मांड स्वतः ही उसे उसके नियत गुरु तक पहुँचा देता है।
एक सच्चा गुरु जब किसी को शिष्य बनाता है, तो वह उसके संचित कर्मों (अच्छे और बुरे दोनों) का एक बड़ा हिस्सा अपने ऊपर ले लेता है, ताकि शिष्य की आध्यात्मिक यात्रा बाधा रहित हो। कोई भी सच्चा संत बेवजह लाखों लोगों के कर्मों का बोझ अपने सूक्ष्म शरीर पर नहीं लेना चाहेगा। भीड़ में अधिकांश लोग केवल अपने स्वार्थ (नौकरी, बीमारी, मुक़दमे) के लिए आते हैं, इसलिये सच्चा गुरु इनसे बचने की चेष्ठा करता है। क्योंकि वह मात्र सांसारिक समस्या समाधान का साधन नहीं है !
कई बार कई सच्चे गुरु बरसों तक एक ही स्थान पर बैठकर केवल एक या दो आत्माओं के परिपक्व होने का इंतज़ार करते हैं। उनका उद्देश्य भीड़ जुटाना नहीं, बल्कि कुछ विशिष्ट आत्माओं को तैय्यार करना होता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें तो सत्य हमेशा नीरस, कठोर और अनुशासन की मांग करने वाला होता है। इसलिये क्षणिक स्वार्थ में जीने वाले समाज की भी सच्चे गुरुओं में कोई रूचि नहीं होती है !
आम जनता को सांत्वना, चमत्कार और सांसारिक इच्छाओं (धन, संतान, सफलता) की पूर्ति के लिये गुरु करती है और जब गुरु उन्हें कुछ सुविधा दे देता है, तो वह उसमें संतुष्ट न होकर सच्चे संत से और नश्वर चीज़ों को प्राप्त करने की अपेक्षा करने लगते हैं। जिससे सच्चे सन्त उन अपरिपक्व शिष्यों को उनके अल्प बुद्धि को विकसित करने के लिये कुछ समय के लिये छोड़ देते हैं ! जिससे वह ‘अहंकार’ और लोभ को वैराग्य से नष्ट कर सकें।
सच्चे संत ध्यान, तप, आत्म-निरीक्षण और विकारों (काम, क्रोध, लोभ) से मुक्ति का मार्ग बताते हैं। न कि किसी की नौकरी प्रमोशन शादी तलाक की जिम्मेदारी लेते हैं अगर उनकी संसार में रूचि होती तो वह सन्त बनाते ही क्यों वह भी सामान्य मनुष्य की तरह संसार के सुख दुःख में रमण करते !
पहुंचे हुए संत की आभामंडल और ऊर्जा का स्तर इतना तीव्र होता है कि साधारण चेतना वाला व्यक्ति उस वातावरण में असहज महसूस करने लगता है। यदि व्यक्ति का मन शुद्ध नहीं है, तो उस उच्च ऊर्जा क्षेत्र में उसके दबे हुए विकार डर, अहंकार, क्रोध आदि सक्रीय हो जाते हैं, जिससे घबराकर सामान्य व्यक्ति सच्चे गुरु से दूरी बना लेता है।
अध्यात्म के सूक्ष्म स्तर पर रहस्यवादी परंपराओं में सिधान्त है कि प्रकृति (माया) स्वयं सच्चे संतों को एक आवरण में छिपा कर रखती है। प्रकृति नहीं चाहती कि अपात्र लोग उस उच्च आध्यात्मिक रहस्यों तक पहुँच सकें। इसलिए, कई बार सच्चे संत जानबूझकर ऐसा अटपटा या कठोर व्यवहार करते हैं कि केवल सच्चा जिज्ञासु ही उनके पास टिक सके और सामान्य लोग उन्हें पागल या साधारण व्यक्ति समझकर लौट जाते हैं।
भीड़ हमेशा मनोरंजन, आसान रास्तों और चमत्कारों में भटकती रहती है। सच्चे संतों का दरबार कोई ‘सुपरमार्केट’ नहीं है जहाँ इच्छाओं का सौदा हो। यह एक ‘ऑपरेशन थिएटर’ की तरह है, जहाँ अहंकार को काट कर जला कर नष्ट किया जाता है। वह बिना बेहोशी की दवा के !
इसलिये सच्चे संतों के पास भीड़ नहीं जुटती है !
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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