सनातन धर्म वितण्डावादियों के हवाले : Yogesh Mishra

सामान्य भाषा में वितण्डावाद का अर्थ निरर्थक दलील, हुज्जत करना या निराधार लड़ाई-झगड़ा करना होता है !

जिसे दूसरे शब्दों में दूसरे की बातों या तर्कों की उपेक्षा करते हुए बस अपनी बात कहते चले जाने की क्रिया को वितण्डावाद कहते हैं !

और जब स्वार्थ या भावनात्मक कारणों से वितण्डावादी लोग किसी भी विषय को लेकर समाज में एक समूह बना लेते हैं, तब समाज का ज्ञान प्रवाह रुक जाता है ! क्योंकि ज्ञान की जीवनी शक्ति तर्क से समाज सही दिशा में चलता है, और वितण्डावादी कभी नहीं चाहते कि समाज में धार्मिक विषयों पर तर्क हो !

इसीलिए वैष्णव धर्म लेखकों ने वैष्णव धर्म ग्रंथों को पढ़ने की एक शर्त यह भी रखी है कि जो व्यक्ति वैष्णव भगवान में श्रृद्धा न रखते हों, उन्हें इन धर्म ग्रंथों को नहीं पढ़ना चाहिए और न ही जनसामान्य को उनके साथ तर्क के आधार पर धर्म चर्चा करनी चाहिए !

 जबकि वास्तविक धर्मगुरु अनादि काल से सदैव ही हर समय समाज के सामने शास्त्रार्थ करने को तैयार रहा करते थे ! जो परंपरा अब वितण्डावादी धर्म गुरुओं ने विलुप्त कर दी है !

 और उसका परिणाम यह हुआ कि धर्म व्यवस्था का चिंतन अब चिंतन और अध्ययन विहीन भीड़ के हाथ में चला गया है ! जिससे धर्म के विकास के स्थान पर धर्म के विनाश की प्रक्रिया शुरू हो गई है !

 उसी का परिणाम है कि जो धर्म कभी पूरे विश्व में अपना प्रभाव रखता था ! आज वह छोटे से भारतवर्ष में भी प्रभावहीन होता चला जा रहा है !

 अब सनातन धर्मियों की रुचि सनातन धर्म में नहीं है बल्कि वह दो राजकुमार राम और कृष्ण के जीवन परिचय में ही सीमित हो गया है ! इसीलिए समाज में उपनिषद दर्शन और वेदांत पर चर्चा बंद हो गई है ! जोकि कभी सनातन जीवन शैली का मूल आधार था !

 और दुर्भाग्यवश हिंदू राम और कृष्ण के कथाओं को ही हिंदू धर्म का आधार मानने लगे हैं ! यही कारण है कि राम और कृष्ण सामान्य इन्सान मानकर चिंतन करने वाले व्यक्तियों को यह वितण्डावादी खूंखार निगाहों से देखते हैं !

और कथावाचक राम और कृष्ण के नाम पर रोज-रोज नई-नई मनगढ़ंत कहानियों को लेकर समाज को लोक लुभावने प्रवचन सुना कर अपना धंधा चला रहे हैं !

यही हिंदू धर्म के सर्वनाश का मूल कारण है !

 आज के तथाकथित हिंदू समाज जोकि वितण्डावादी धर्म गुरुओं के प्रभाव में हैं ! वह किसी भी शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक तर्क को मानने को तैयार नहीं है !

 क्योंकि इससे उन्होंने जो अपने तथाकथित भगवान का प्रभाव समाज में बना रखा है, उसके जीर्ण क्षीर्ण हो जाने की पूरी सम्भावना हो जाती है ! जिससे उन्हें लगता है कि उनका धर्म खतरे में आ जाएगा ! जबकि धर्म नहीं उन वितण्डावादी धर्म गुरुओं का धंधा खतरे में आता है !

और उसका परिणाम यह होता है कि ऐसे लोग विद्वानों की बातों की उपेक्षा करते हुये अपनी बात को बिना किसी आधार के कहते चले जाते हैं और अपनी बात को मनाने के लिए अब यह वितण्डावादी हिंसा का प्रयोग करने में संकोच नहीं करते हैं !

आज पूरा धार्मिक वितण्डावादी, लोगों को भयभीत करके धर्म की रक्षा करना चाहता है !  जबकि इससे धर्म की रक्षा नहीं बल्कि शास्त्रार्थ के अभाव में धर्म का सर्वनाश हो रहा है !

 इसलिए यदि सनातन धर्म को बचाना है तो धर्म को वितण्डावादियों के हाथ से निकाल कर शास्त्रार्थ विशेषज्ञों के हाथ में देना होगा ! तभी धर्म और समाज दोनों की रक्षा होगी !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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